भारतीय सिनेमा के बदलते विमर्श में धुरंधर 2 केवल एक फिल्म नहीं, अपितु एक वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह उस दौर की उपज है, जहाँ फिल्मों को अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सॉफ्ट पावर के रूप में देखा जा रहा है, ऐसा माध्यम जो बिना हथियार उठाए दुनिया के मानस को प्रभावित कर सकता है। “धुरंधर” और “धुरंधर 2” जैसी फिल्में इसी शक्ति से लैस होकर एक नए नैरेटिव की स्थापना कर रही हैं, जो भारत, उसकी सुरक्षा प्रणाली और उसके सांस्कृतिक आत्मबोध को नए सिरे से परिभाषित करता है। फिल्म “धुरंधर 2” की कहानी जासूसी की उस गुप्त दुनिया को सामने लाती है, जिसे आमतौर पर पर्दे पर या तो अत्यधिक ग्लैमराइज किया जाता है या फिर पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जाता है। यहाँ जासूस केवल एक रोमांचक पात्र नहीं, अपितु राष्ट्र के सुरक्षा चक्र का सबसे गुप्त और निर्णायक अस्त्र है। फिल्म का नायक किसी एक व्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करता, अपितु वह उन अनेक गुमनाम नायकों का समेकित रूप है,जिन्होंने अपने नाम, पहचान और अस्तित्व तक का बलिदान कर दिया। यही वह बिंदु है जहाँ फिल्म केवल कहानी नहीं रहती, बल्कि एक भावनात्मक और ...
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