चार मई 2026 की सुबह पश्चिम बंगाल में कुछ ऐसा माहौल था, जैसे मौसम विभाग ने पहली बार राजनीतिक परिवर्तन की सटीक भविष्यवाणी कर दी हो। सूरज तो रोज़ की तरह ही उगा, लेकिन इस बार रोशनी का रंग कुछ ज़्यादा ही केसरिया महसूस हो रहा था। मतगणना शुरू होते ही टीवी स्टूडियो में उत्साह और कुछ दफ्तरों में सन्नाटा...दोनों साथ-साथ दिखने लगे, मानो लोकतंत्र ने एक ही दिन में कॉमेडी और थ्रिलर का संयुक्त प्रदर्शन तय कर लिया हो। पिछले कई सालों से ममता बनर्जी का राजनीतिक किला इतना मजबूत बताया जाता था कि लोग उसे अटूट मान बैठे थे। मगर 2026 ने यह भ्रम भी बड़े सलीके से तोड़ दिया। किला अचानक ऐसा लगा जैसे बाहर से संगमरमर और अंदर से प्लास्टर...पहली तेज़ हवा में ही दरारें दिखने लगीं। जनता ने जैसे यह कह दिया कि भावनाओं की राजनीति अपनी जगह है, पर जब रोज़मर्रा की समस्याएँ बढ़ती हैं, तो नारों की उम्र छोटी पड़ जाती है।इधर PM नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी इस चुनाव में किसी चुनावी टीम से ज्यादा एक लंबे प्रोजेक्ट के मैनेजरों की तरह दिखी।एक तरफ बड़े विज़न की बातें, दूसरी तरफ ज़मीनी स्तर पर बारीक रणनीति जैसे किसी ने राजनी...
भारतीय लोकतंत्र अपने आप में एक जीवंत, गतिशील और बहुस्तरीय प्रणाली है, जहां राजनीतिक दल समय-समय पर अपनी रणनीतियों, नेतृत्व शैली और वैचारिक प्रस्तुति को बदलते रहते हैं। इसी क्रम में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)का हालिया राजनीतिक व्यवहार एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। लंबे समय तक यह धारणा रही कि भाजपा एक ऐसी पार्टी है, जो मुख्यतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)की पृष्ठभूमि से आने वाले नेताओं को प्राथमिकता देती है। संगठनात्मक अनुशासन, वैचारिक प्रतिबद्धता और वर्षों की साधना को नेतृत्व का आधार माना जाता था।किन्तु पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने इस पारंपरिक ढांचे को लचीला बनाते हुए एक नया नेतृत्व मॉडल विकसित किया है। अब पार्टी उन नेताओं को भी शीर्ष पद पर स्थापित कर रही है, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अन्य दलों से की हो। इस बदलाव का सबसे ताजा और महत्वपूर्ण उदाहरण सम्राट चौधरी हैं, जो बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं। सम्राट चौधरी: उनकी राजनीतिक यात्रा राष्ट्रीय जनता दल से शुरू होकर जनता दल (यूनाइटेड) के रास्ते भाजपा तक पहुंची। यह केवल व्यक्तिगत उन्नति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक...