नवंबर का महीना था। दिल्ली की राजनीतिक हवाओं में संविधान दिवस की तैयारियां चल रही थीं। संसद के गलियारों से लेकर चुनावी मंचों तक संविधान की चर्चा थी। इसी बीच विक्रम एक बार फिर बेताल को अपने कंधे पर लादकर श्मशान की ओर चल पड़े। बेताल अपनी रहस्यमयी हँसी हँसा और बोला, “राजन! आज मैं तुम्हें भारतीय राजनीति के उस रंगमंच की कथा सुनाता हूँ, जहाँ संविधान की किताब मुख्य पात्र है। इस नाटक में एक ऐसे नेता भी हैं, जो संविधान की प्रति हाथ में लेकर लोकतंत्र की रक्षा की बात करते हैं, लेकिन चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक पटकथा में नए अध्याय जुड़ जाते हैं।” विक्रम हौले से मुस्कुराए और बोले, “बेताल, तुम्हारा संकेत मैं समक्ष गया। लेकिन, याद रखना, लोकतंत्र में व्यंग्य का उद्देश्य किसी का व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि राजनीतिक आचरण और सार्वजनिक दावों की पड़ताल होना चाहिए।” बेताल ने उत्तर दिया, “राजन! आज निशाना किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी नहीं, बल्कि राजनीति की वह शैली है, जिसमें लाल किताब हाथ में दिखाई देती है और जनता उसके विचारों को व्यवहार में तलाशती रहती है।” Published in 'Prerna Vichar' Monthly Magazin...
Image Source: Google आधी रात का समय था। श्मशान के सन्नाटे में राजा विक्रमादित्य एक बार फिर बेताल को अपने कंधे पर लादकर चल पड़े। रास्ते में बेताल ने अपने चिरपरिचित अंदाज में हँसा और बोला, राजन! आज मैं आपको ऐसी पॉलिटिकल पार्टी की कहानी सुनाता हूँ, जिसके पास इतिहास तो है, लेकिन भविष्य को लेकर सवाल हैं, जिसके पास नेतृत्व तो है, लेकिन नेतृत्व की दिशा पर बहस है और जिसके पास विचारधारा तो इतनी है कि कभी-कभी विचार ही एक-दूसरे से पूछने लगते हैं...भाई, आखिर हम जा कहाँ रहे हैं?” विक्रम ने गंभीर होकर कहा, "बेताल! पहेलियाँ बुझाने के बजाय सीधे कहानी बताओ।" बेताल बोला, “अच्छा, तो सुनो राजन! यह कहानी है उस पार्टी की, जो देश की सबसे बड़ी-बूढ़ी है, जिसने कभी स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत सँभाली, देश पर लंबे समय तक शासन किया और अपने आपको भारत की राजनीति का स्वाभाविक केंद्र समझता रहा। लेकिन समय बदला, मतदाता बदले, राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया...विरासत के सहारे कब तक भविष्य की राजनीति की जा सकती है?” विक्रम बोले, “तुम कांग्रेस की बात कर रहे हो?” बेताल ने मु...