Image Source: google पत्रकारिता के विद्यार्थी अक्सर पढ़ते हैं कि समाचार क्या होता है। उन्हें सिखाया जाता है कि जिसे कोई छिपाना चाहता है, वही समाचार है, बाकी सब विज्ञापन है । लेकिन प्रेम के क्षेत्र में कुछ पुरुषों ने इस सिद्धांत को उल्टा कर दिया है। यहां जो बात दो लोगों के बीच छिपी रहनी चाहिए, वही सबसे पहले समाचार बना दी जाती है। जो स्मृतियां निजी होनी चाहिए, वे ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती हैं। जो संवाद सिर्फ दो दिलों के बीच होने चाहिए, वे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना दिए जाते हैं। और फिर वही लोग शिकायत करते हैं कि लड़कियां प्रेम से डरती हैं। लड़कियां प्रेम से नहीं डरतीं। वे इस बात से डरती हैं कि कहीं उनका प्रेमी भविष्य में एक चलता-फिरता मीडिया हाउस न निकल जाए। प्रेम के समय वह व्यक्ति प्रेमी होता है, लेकिन ब्रेकअप के बाद अचानक संपादक, रिपोर्टर, पीआर एजेंट, कंटेंट क्रिएटर, डिजिटल मार्केटर और सोशल मीडिया मैनेजर सब कुछ बन जाता है। उसके पास पुरानी तस्वीरों का आर्काइव होता है, चैट्स का डेटाबेस होता है, निजी बातों की रिकॉर्डिंग होती है और सबसे खतरनाक चीज़ होती है...घायल अहंकार। मीडिया की भाषा म...
कई लोग सत्ता के करीब जन्म लेते हैं,लेकिन पूरी जिंदगी अपनापन पाने के लिए भटकते रहते हैं। कुछ लोगों को विरासत मिलती है, कुछ लोगों को विरासत के साथ एक ऐसा मौन अकेलापन भी मिलता है, जिसे वे कभी शब्दों में नहीं कह पाते।प्रतीक यादव की कहानी भी शायद उसी अनकहे दर्द की कहानी है। एक ऐसा व्यक्ति, जिसके पास नाम था, पहचान थी, संसाधन थे, लेकिन फिर भी कहीं भीतर वह हमेशा अपनी जगह तलाशता हुआ दिखाई दिया। यह कहानी केवल किसी राजनीतिक परिवार के सदस्य की निजी कहानी नहीं है। यह भारतीय समाज की उस गहरी संरचना को सामने लाती है जहाँ व्यक्ति की पहचान केवल उसके व्यक्तित्व से नहीं, अपितु उसके जन्म, वंश, जाति, सामाजिक स्वीकृति और पारिवारिक स्वीकार्यता से तय की जाती है। मानवशास्त्र में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, “Belonging vs Exclusion” अर्थात व्यक्ति किसी परिवार, समुदाय या व्यवस्था का हिस्सा तो होता है, लेकिन भावनात्मक रूप से स्वयं को कभी पूर्णतः स्वीकार किया गया महसूस नहीं करता। प्रतीक यादव का जीवन कई मायनों में इसी संघर्ष का प्रतीक प्रतीत होता है।वर्ष 1988 में जन्मे प्रतीक का शुरुआती जीवन सामान्य नहीं था। बचपन में ह...