इतिहास केवल पहले की घटनाओं का ही संग्रह नहीं होता, वह वर्तमान को समझने और भविष्य को चेताने का दर्पण भी होता है। जब-जब अहंकार में सत्ता ने स्वयं को आम जनता से ऊपर रखा है, जब-जब शासकों ने, राजनेताओं ने, संवाद के बजाय दमन को चुना है, तब-तब देशों ने बहुत भारी कीमत चुकाई है। आज ईरान उसी खतरनाक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। वहाँ जो कुछ घट रहा है, वह केवल एक आंतरिक राजनीतिक संकट नहीं, अपितु एक ऐसा घटनाक्रम है जिसके दूरगामी प्रभाव समूची धरा को प्रभावित कर सकते हैं। भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे जुड़ी मानवीय, आर्थिक और रणनीतिक चिंताएँ सीधे हमारे राष्ट्रीय हितों से जुड़ी हैं। ईरान में मौजूदा अस्थिरता की जड़ें उस शासन व्यवस्था में हैं, जो वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अस्तित्व में आई। अयातुल्लाह खामेनेई द्वारा स्थापित वैचारिक ढाँचा आज भी सत्ता की रीढ़ बना हुआ है। समय के साथ यह व्यवस्था जनता की आकांक्षाओं से दूर होती चली गई। शासन की वैधता जनसमर्थन से नहीं, बल्कि क़ानून, बल और भय से सुनिश्चित की जाने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि आम नागरिक की समस्याएँ (महंगाई, बेरोज़...
इस आधुनिक तकनीक के युग में, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) चंद सेकंडों में कुछ भी रच देती है, जहां सैटेलाइट से धरती के नीचे दबी टंकी भी दिख जाती है, वहीं हमारा मीडिया आज भी अफवाह नामक अति प्राचीन कला को आधुनिक तकनीक के साथ जीवित रखे हुए है। फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र जी अस्पताल से डिस्चार्ज हुए, लेकिन हमारे मीडिया ने उन्हें पहले ही स्वर्गीय घोषित कर दिया! खेद की बात तो यह है कि कुछ चैनलों ने श्रद्धांजलि विशेष चलाया, कुछ ने धर्मेंद्र की के आखिरी शब्द भी खोज निकाले और सोशल मीडिया पर तो श्रद्धांजलियों की बाढ़ ही सुनामी आ गई। सवाल यह है कि कौन मरा और कौन पत्रकार जिंदा? आज के वैरायटी पत्रकार ख़बर नहीं बनाते, ख़बर के बन जाने की जल्दी में रहते हैं। एक दौर था जब रिपोर्टर फील्ड में पसीना बहाता था, अब बस एक ट्वीट या वाट्सऐप मैसेज आ जाए, तो न्यूज़ रूम में घंटियाँ बज उठती हैं.....ब्रेकिंग! पहले हम चला देंगे, बाद में देखेंगे कि सही है या नहीं। इस दौर में ब्रेकिंग न्यूज़ का मतलब हो गया है...पहले तोड़ दो, बाद में जोड़ना देखेंगे। सत्यापन (verification) शब्द अब न्यूज़ डिक्शनरी से लुप्त हो चुका है। जो कभी...