कई लोग सत्ता के करीब जन्म लेते हैं,लेकिन पूरी जिंदगी अपनापन पाने के लिए भटकते रहते हैं। कुछ लोगों को विरासत मिलती है, कुछ लोगों को विरासत के साथ एक ऐसा मौन अकेलापन भी मिलता है, जिसे वे कभी शब्दों में नहीं कह पाते।प्रतीक यादव की कहानी भी शायद उसी अनकहे दर्द की कहानी है। एक ऐसा व्यक्ति, जिसके पास नाम था, पहचान थी, संसाधन थे, लेकिन फिर भी कहीं भीतर वह हमेशा अपनी जगह तलाशता हुआ दिखाई दिया। यह कहानी केवल किसी राजनीतिक परिवार के सदस्य की निजी कहानी नहीं है। यह भारतीय समाज की उस गहरी संरचना को सामने लाती है जहाँ व्यक्ति की पहचान केवल उसके व्यक्तित्व से नहीं, अपितु उसके जन्म, वंश, जाति, सामाजिक स्वीकृति और पारिवारिक स्वीकार्यता से तय की जाती है। मानवशास्त्र में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, “Belonging vs Exclusion” अर्थात व्यक्ति किसी परिवार, समुदाय या व्यवस्था का हिस्सा तो होता है, लेकिन भावनात्मक रूप से स्वयं को कभी पूर्णतः स्वीकार किया गया महसूस नहीं करता। प्रतीक यादव का जीवन कई मायनों में इसी संघर्ष का प्रतीक प्रतीत होता है।वर्ष 1988 में जन्मे प्रतीक का शुरुआती जीवन सामान्य नहीं था। बचपन में ह...
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बीजिंग में पहुंचे थे "डील मेकर" बनकर, लेकिन शी जिनपिंग ने बैठते ही ताइवान वाली “रेड लाइन” टेबल पर रख दी। कहानी कुछ ऐसी रही कि ट्रंप बोले... “शी मेरे अच्छे दोस्त हैं…” और उधर शी जिनपिंग ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया... “दोस्ती अपनी जगह, लेकिन ताइवान पर उंगली उठी तो फिर दोस्ती भी सीमा शुल्क में फंस जाएगी!” दो घंटे की बैठक में चीन ने अमेरिका को साफ संदेश दे दिया कि “वन चाइना पॉलिसी कोई WhatsApp DP नहीं है, जिसे कभी भी बदल दिया जाए।” ट्रंप ने माहौल हल्का करने के लिए चीन-अमेरिका रिश्तों को भविष्य के लिए जरूरी बताया, लेकिन शी जिनपिंग का अंदाज़ ऐसा था जैसे कोई स्कूल का प्रिंसिपल लेट आए छात्र को अनुशासन समझा रहा हो। उधर दुनिया सोच रही थी कि ट्रेड वॉर पर बात होगी, लेकिन चीन ने पूरा GPS घुमाकर ताइवान पर सेट कर दिया।और मजेदार बात ये रही कि जब बीजिंग में ट्रंप और जिनपिंग “शांति” की बातें कर रहे थे, उसी वक्त रूस ने यूक्रेन पर मिसाइलों की बारिश तेज कर दी। मतलब दुनिया का हाल ऐसा हो चुका है कि एक तरफ महाशक्तियां “डायलॉग” कर रही हैं, दूसरी तरफ मिसाइलें “लाइव कमे...