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Showing posts from 2026

"आउटसाइडर” से सत्ता के शिखर तक: भाजपा की बदलती राजनीति और नेतृत्व का नया मॉडल

भारतीय लोकतंत्र अपने आप में एक जीवंत, गतिशील और बहुस्तरीय प्रणाली है, जहां राजनीतिक दल समय-समय पर अपनी रणनीतियों, नेतृत्व शैली और वैचारिक प्रस्तुति को बदलते रहते हैं। इसी क्रम में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी)का हालिया राजनीतिक व्यवहार एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है। लंबे समय तक यह धारणा रही कि भाजपा एक ऐसी पार्टी है, जो मुख्यतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)की पृष्ठभूमि से आने वाले नेताओं को प्राथमिकता देती है। संगठनात्मक अनुशासन, वैचारिक प्रतिबद्धता और वर्षों की साधना को नेतृत्व का आधार माना जाता था।किन्तु पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने इस पारंपरिक ढांचे को लचीला बनाते हुए एक नया नेतृत्व मॉडल विकसित किया है। अब पार्टी उन नेताओं को भी शीर्ष पद पर स्थापित कर रही है, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अन्य दलों से की हो। इस बदलाव का सबसे ताजा और महत्वपूर्ण उदाहरण सम्राट चौधरी हैं, जो बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं। सम्राट चौधरी: उनकी राजनीतिक यात्रा राष्ट्रीय जनता दल से शुरू होकर जनता दल (यूनाइटेड) के रास्ते भाजपा तक पहुंची। यह केवल व्यक्तिगत उन्नति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक...

धुरंधर 2: वॉर ऑफ़ नैरेटिव्स में भारतीय अस्मिता का उभार

भारतीय सिनेमा के बदलते विमर्श में धुरंधर 2 केवल एक फिल्म नहीं, अपितु एक वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह उस दौर की उपज है, जहाँ फिल्मों को अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सॉफ्ट पावर के रूप में देखा जा रहा है, ऐसा माध्यम जो बिना हथियार उठाए दुनिया के मानस को प्रभावित कर सकता है। “धुरंधर” और “धुरंधर 2” जैसी फिल्में इसी शक्ति से लैस होकर एक नए नैरेटिव की स्थापना कर रही हैं, जो भारत, उसकी सुरक्षा प्रणाली और उसके सांस्कृतिक आत्मबोध को नए सिरे से परिभाषित करता है। फिल्म “धुरंधर 2” की कहानी जासूसी की उस गुप्त दुनिया को सामने लाती है, जिसे आमतौर पर पर्दे पर या तो अत्यधिक ग्लैमराइज किया जाता है या फिर पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जाता है। यहाँ जासूस केवल एक रोमांचक पात्र नहीं, अपितु राष्ट्र के सुरक्षा चक्र का सबसे गुप्त और निर्णायक अस्त्र है। फिल्म का नायक किसी एक व्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करता, अपितु वह उन अनेक गुमनाम नायकों का समेकित रूप है,जिन्होंने अपने नाम, पहचान और अस्तित्व तक का बलिदान कर दिया। यही वह बिंदु है जहाँ फिल्म केवल कहानी नहीं रहती, बल्कि एक भावनात्मक और ...

ईरान में धधकता संकट: विश्व विवेक की कठिन परीक्षा

इतिहास केवल पहले की घटनाओं का ही संग्रह नहीं होता, वह वर्तमान को समझने और भविष्य को चेताने का दर्पण भी होता है। जब-जब अहंकार में सत्ता ने स्वयं को आम जनता से ऊपर रखा है, जब-जब शासकों ने, राजनेताओं ने, संवाद के बजाय दमन को चुना है, तब-तब देशों ने बहुत भारी कीमत चुकाई है। आज ईरान उसी खतरनाक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। वहाँ जो कुछ घट रहा है, वह केवल एक आंतरिक राजनीतिक संकट नहीं, अपितु एक ऐसा घटनाक्रम है जिसके दूरगामी प्रभाव समूची धरा को प्रभावित कर सकते हैं। भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे जुड़ी मानवीय, आर्थिक और रणनीतिक चिंताएँ सीधे हमारे राष्ट्रीय हितों से जुड़ी हैं। ईरान में मौजूदा अस्थिरता की जड़ें उस शासन व्यवस्था में हैं, जो वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अस्तित्व में आई। अयातुल्लाह खामेनेई द्वारा स्थापित वैचारिक ढाँचा आज भी सत्ता की रीढ़ बना हुआ है। समय के साथ यह व्यवस्था जनता की आकांक्षाओं से दूर होती चली गई। शासन की वैधता जनसमर्थन से नहीं, बल्कि क़ानून, बल और भय से सुनिश्चित की जाने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि आम नागरिक की समस्याएँ (महंगाई, बेरोज़...