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डोंडा वाला बाग: एक गांव, एक मेला और बचपन की अनमोल दुनिया

!!श्रीश्री 1008 रामानंद जी महाराज!!      Photo Credit: Raju

डोंडा वाला बाग: एक गांव, एक मेला और बचपन की अनमोल दुनिया

अख़तीज की सुबह
गांव की मिट्टी में एक अजीब-सी बात होती है। वह इंसान के पैरों से चिपककर नहीं रहती, अपितु उसकी यादों में बस जाती है। आदमी गांव छोड़कर शहर चला जाए, बड़े-बड़े मकानों में रहने लगे, उसकी जेब में नोटों की गड्डियां आ जाएं और दुनिया की तमाम सुविधाएं उसके सामने हाथ बांधे खड़ी रहें, फिर भी बचपन की कोई छोटी-सी घटना अचानक उसके भीतर एक पूरा गांव जगा देती है।
कभी कुएं पर नहाते बच्चों की आवाजें सुनाई देने लगती हैं, कभी बैलगाड़ी के पहियों की चरमराहट कानों में गूंजने लगती है, तो कभी धूल उड़ाती पगडंडी पर नंगे पांव भागता हुआ अपना ही बचपन दिखाई देने लगता है। और अगर वह बचपन किसी गांव के मेले से जुड़ा हो, तो फिर कहना ही क्या! डोंडा वाला बाग भी ऐसी ही यादों का एक संसार था। एक ऐसा संसार, जहां साल में एक दिन बच्चों के लिए पूरा आसमान खुल जाता था। जहां दो रुपये की बांसुरी किसी राजमहल के खिलौने से कम नहीं थी, जहां लकड़ी की तीन पहियों वाली गाड़ी में भविष्य की तमाम यात्राएं दिखाई देती थीं और जहां गुब्बारा खरीद लेने वाला बच्चा कुछ देर के लिए स्वयं को दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान समझता था।
यह कहानी उसी संसार की है। उस समय की, जब गांव में मनोरंजन के साधन कम थे, लेकिन ख़ुशियों के बहाने बहुत थे। जब बच्चों के पास मोबाइल फोन नहीं थे, पर उनके पास एक-दूसरे के घर तक दौड़कर जाने की आज़ादी थी। जब समय देखने के लिए हर किसी की कलाई पर घड़ी नहीं होती थी, फिर भी गांव के लोग सूरज की चाल, पशुओं की आवाज और खेतों से लौटती बैलगाड़ियों के पहियों से दिन का हिसाब लगा लेते थे। यह 90 के दशक की बात है। गर्मियों के दिन थे। वैशाख का महीना अपने पूरे तेवर में था। सुबह की धूप अभी इतनी कठोर नहीं हुई थी कि धरती पर पैर रखना मुश्किल हो जाए, लेकिन हवा में गर्मी की आहट साफ सुनाई देने लगी थी। गांव के कच्चे रास्तों पर कहीं-कहीं रात की नमी बची हुई थी। घरों के आंगन में झाड़ू लग चुकी थी। चूल्हों से उठता धुआं धीरे-धीरे हवा में घुल रहा था। कहीं गायों को चारा डाला जा रहा था, कहीं भैंसों के सामने पानी से भरी नांद रखी जा रही थी और कहीं घर की महिलाएं दिनभर के काम की तैयारी में जुटी थीं। मगर गांव के बच्चों के लिए उस सुबह का अर्थ कुछ और था। आज अख़तीज थी और अख़तीज का मतलब था...गांव के डोंडा वाले बाग का मेला!
बच्चों की दुनिया में कुछ तारीखें कैलेंडर देखकर याद नहीं रखनी पड़तीं। वे दिल में दर्ज होती हैं। अख़तीज भी ऐसी ही एक तारीख थी। मेले से कई दिन पहले ही गांव की गलियों में उसकी चर्चा शुरू हो जाती थी। कौन-सी दुकान आएगी? इस बार बांसुरी कितने की मिलेगी? लकड़ी की गाड़ी खरीदनी चाहिए या रंगीन गुब्बारा? मिठाई खानी है या मलपुआ? घर लौटते समय छोटे भाई के लिए क्या ले जाएंगे? बहन को चूड़ी पसंद आएगी या कोई छोटी-सी गुड़िया?
ये सवाल बच्चों के लिए साधारण नहीं थे। ये उनकी छोटी-सी दुनिया की सबसे बड़ी योजनाएं थीं। उन दिनों बच्चों के पास अपनी इच्छाओं की लंबी सूची तो होती थी, लेकिन उन्हें पूरा करने के साधन बहुत सीमित थे। घर में पैसे होते भी थे, तो बच्चों की जेब तक पहुंचने के लिए उन्हें कई घरेलू जिम्मेदारियों, माता-पिता की अनुमति और कभी-कभी किस्मत की परीक्षा से गुजरना पड़ता था। इसलिए मेले का पैसा मिलना अपने आप में एक उपलब्धि थी। जिस बच्चे के हाथ में पहले से कुछ रुपये होते, उसका आत्मविश्वास अलग दिखाई देता था। वह ऐसे चलता, जैसे मेले की सारी दुकानों से उसका पुराना परिचय हो। और जिसके पास अभी तक एक भी पैसा नहीं आया था, वह हर आने-जाने वाले बड़े की ओर उम्मीद से देखता।
उस सुबह गांव के बच्चों के चेहरे पर खुशी थी, लेकिन हर चेहरे की खुशी का अपना हिसाब था। किसी ने मन ही मन तय कर लिया था कि पहले बांसुरी खरीदेगा। कोई मिठाई के बारे में सोच रहा था। किसी को लकड़ी की छोटी गाड़ी चाहिए थी, जिसे वह घर लाकर अपने आंगन में दौड़ाएगा। कुछ बच्चे ऐसे भी थे, जो अपने लिए कुछ खरीदने से पहले छोटे भाई-बहन के लिए सामान लेना चाहते थे। बचपन की उदारता का भी अपना एक रूप होता है। बच्चे खुद छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसते हैं, फिर भी किसी अपने के लिए कुछ ले जाने का विचार उन्हें बड़ा बना देता है। लेकिन इन सारी योजनाओं के बीच एक छोटी-सी समस्या थी। पैसे अभी तक मिले नहीं थे। और बिना पैसे के मेला जाना वैसा ही था, जैसे किसी भूखे आदमी को पकवानों की पूरी थाली दिखाकर कह दिया जाए कि बस देखना, खाना नहीं।
गांव के उस बाग का नाम केवल पेड़ों और जमीन के कारण नहीं था। उसके साथ आस्था, परंपरा और पीढ़ियों की स्मृतियां जुड़ी हुई थीं। श्रीश्री 1008 रामानंद जी महाराज ने इस बाग को अपने स्नेह और प्रयासों से पुष्पित-पल्लवित किया था। गांव के अनेक लोगों के लिए वह स्थान केवल एक बाग नहीं, बल्कि श्रद्धा का केंद्र था। महाराज जी अब स्थूल रूप में लोगों के बीच उपस्थित नहीं थे, लेकिन गांव की स्मृतियों में उनकी उपस्थिति बनी हुई थी। किसी पुराने वृक्ष के नीचे बैठा बुजुर्ग उनकी कोई बात याद कर लेता, तो किसी दूसरे के पास उनसे जुड़ा कोई प्रसंग होता। आस्था का संसार अक्सर इसी तरह चलता है। किसी व्यक्ति की भौतिक उपस्थिति समाप्त हो जाती है, लेकिन उसके शब्द, कर्म और उससे जुड़ी जगहें लोगों के जीवन में अपना स्थान बनाए रखती हैं। बच्चों के लिए हालांकि बाग का एक दूसरा ही अर्थ था। उन्हें वहां होने वाली भागवत कथा, साधु-संतों की उपस्थिति और धार्मिक वातावरण के बारे में कुछ जानकारी थी, लेकिन उनकी उत्सुकता का केंद्र मेले की दुकानें थीं। उन्हें यह जानने में अधिक रुचि थी कि बांसुरी बेचने वाला कहां बैठेगा, मिठाई की दुकान किस ओर लगेगी और लकड़ी के खिलौने वाला इस बार कौन-से नए खिलौने लाएगा।
उस समय बाग में भागवत कथा का आयोजन होता था। कथा सुनने के लिए गांव और आसपास के इलाकों से लोग आते थे। धार्मिक आयोजन के साथ मेला भी सजता था। धीरे-धीरे अस्थायी दुकानों की कतारें बनतीं, खिलौनों की रंगीन दुनिया तैयार होती और खाने-पीने की चीजों की खुशबू वातावरण में घुलने लगती। बच्चे कथा के कुछ शब्द सुनते, कुछ बातें समझते और कुछ देर बाद फिर खिलौनों की चर्चा में खो जाते। धर्म, लोकजीवन और मनोरंजन का यह मेल गांवों की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा था। यहां धार्मिक आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहते थे; वे लोगों के मिलने, रिश्ते निभाने, पुराने परिचितों से मिलने और बच्चों को सामुदायिक जीवन से परिचित कराने के अवसर भी बनते थे। डोंडा वाला बाग भी इसी परंपरा का एक जीवंत हिस्सा था। बड़ों की दृष्टि में बाग श्रद्धा का स्थान था, जबकि बच्चों की दृष्टि में वही बाग आश्चर्यों का संसार था। और शायद किसी स्थान की असली खूबसूरती भी यही होती है कि वह अलग-अलग उम्र के लोगों को अलग-अलग अर्थ देता है।
सुबह के आठ बज चुके थे। सूरज अब धीरे-धीरे अपनी गर्मी बढ़ा रहा था। बच्चों के लिए यह समय सामान्य सुबह जैसा नहीं था। हर गुजरते मिनट के साथ उनकी बेचैनी बढ़ रही थी। जिन बच्चों को रुपये मिल चुके थे, वे मन ही मन मेले की दुकानों का नक्शा बना रहे थे। उन्हें पता था कि कहां जाना है, क्या खरीदना है और किस मित्र के साथ रहना है। लेकिन जिनके हाथ खाली थे, उनकी स्थिति अलग थी। वे बार-बार घर के भीतर झांकते। कभी मां से पूछते, कभी पिता के लौटने का रास्ता देखते और कभी बिना किसी कारण आंगन से बाहर निकलकर गली में खड़े हो जाते। उनके लिए हर आवाज एक संभावना थी। दूर से आती बैलगाड़ी की चरमराहट सुनाई देती, तो लगता कि शायद पिता खेत से लौट रहे हैं। किसी के कदमों की आहट आती, तो मन में उम्मीद जागती। लेकिन कुछ ही क्षण बाद पता चलता कि आने वाला कोई दूसरा है।
इसी बीच कुछ बच्चे ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी मेहनत से मेले का खर्च जुटा लिया था। गर्मी के दिनों में वे सिला बीनते थे। खेतों में अनाज की कटाई के बाद बचे दानों को चुनना, उन्हें इकट्ठा करना और फिर कूट-पीटकर उपयोग के योग्य बनाना आसान काम नहीं था। धूप में घंटों मेहनत करने के बाद जो थोड़ा-बहुत अनाज मिलता, उसे बेचकर वे दस-बीस रुपये जुटा लेते। आज के समय में शायद कोई बच्चा दस-बीस रुपये को देखकर विशेष उत्साहित न हो, लेकिन 1990 के उस ग्रामीण परिवेश में इतनी रकम भी बच्चों के लिए काफी महत्व रखती थी। उस पैसे में केवल खरीदारी की संभावना नहीं थी। उसमें आत्मनिर्भरता का एक छोटा-सा गर्व भी छिपा था। वे बच्चे मेले में क्या-क्या बिकने वाला है, इसका अंदाजा पहले ही लगा लेते थे। भागवत कथा सुनने के लिए बाग जाने का उनका सिलसिला मेले की तैयारी में भी मदद करता था। उन्हें दुकानदारों के आने, सामान सजाने और अलग-अलग चीजों की कीमतों का कुछ-कुछ अनुमान हो जाता था। इसलिए जिन बच्चों के पास अपने पैसे थे, वे दूसरों की तुलना में अधिक निश्चिंत दिखाई देते थे। उन्हें अब केवल मेले तक पहुंचना था। बाकी बच्चों के लिए अभी असली परीक्षा बाकी थी।
अख़तीज की सुबह बच्चों ने जल्दी उठने का फैसला पहले ही कर लिया था। किसी को जगाने की जरूरत नहीं थी। मेले की उत्सुकता अपने आप नींद खोल देती थी। वे कुएं पर नहाने पहुंच गए। उस समय गांवों में कुआं केवल पानी लेने का साधन नहीं था। वह सामुदायिक जीवन का हिस्सा था। वहां पानी भरने वाले लोग मिलते, बातचीत होती, दिनभर के काम की चर्चा होती और बच्चे भी उसी वातावरण में बड़े होते। बच्चों ने कुएं पर नहाया-धोया। किसी ने बालों में पानी डालकर हाथों से संवारा, तो किसी ने घर लौटकर सरसों का तेल लगाया और कंघी की। फिर कपड़ों की बारी आई। किसी ने धारीदार कमीज पहनी, किसी ने चेक वाली। किसी की कमीज पुरानी थी, लेकिन धुली हुई थी। किसी ने उसे पिछली शाम ही तैयार करके रख दिया था। उन कपड़ों में आज की तारीख के लिए एक विशेष चमक थी। बच्चों के पास न नए कपड़ों की भरमार थी, न फैशन के अनगिनत विकल्प। लेकिन जो कपड़ा पहनकर वे मेले जाने वाले थे, वही उनके लिए खास था। किसी ने कमीज के बटन गिने। किसी ने आस्तीन ठीक की। किसी ने बालों में कंघी दोबारा चलाई। फिर सबने एक-दूसरे को देखा और मन ही मन सोचा कि अब बस रुपये मिल जाएं, तो चल पड़ें।
लेकिन घर के बड़े बैलगाड़ी लेकर खेतों की ओर जा चुके थे। उन्हें मलुआ लाना था। बच्चों की सारी तैयारी घर के आंगन में खड़ी थी, लेकिन उनके हाथों में मेले का टिकट समझे जाने वाले रुपये नहीं थे। वे इंतजार करने लगे। और गांव में इंतजार करना भी एक कला थी। कभी कोई बच्चा खेलमला की ओर चला जाता, जहां उस समय आसपास ज्यादा लोग दिखाई नहीं देते थे। कोई बंजारों के डेरे की ओर निकल जाता। कोई नंगामील की तरफ चला जाता, तो कोई ऊपरी की ओर। ये स्थान बच्चों की दुनिया के परिचित हिस्से थे। हर जगह का अपना आकर्षण था, अपनी कहानी थी और अपनी पहचान थी। लेकिन घूमते हुए भी उनकी निगाह बार-बार घर की दिशा में उठ जाती। कहीं बैलगाड़ी लौट तो नहीं आई?
गांव में एक पुरानी कहावत कही जाती थी...अपने हाथ का पैसा समय पर काम आता है। उस सुबह यह कहावत बच्चों के सामने साकार हो रही थी। घड़ी की सुई साढ़े आठ के करीब पहुंच रही थी। धूप अब तेज होने लगी थी। जिन बच्चों के पास पैसे थे, वे मेले की राह पकड़ने को तैयार थे। जिनके पास नहीं थे, उनके लिए हर मिनट भारी होता जा रहा था। तभी किसी ने दूर से आवाज लगाई, “अरे, तेरे पापा की बैलगाड़ी आ गई!” यह सुनते ही बच्चों के चेहरे खिल उठे। जैसे किसी ने उनकी प्रतीक्षा को अचानक समाप्त करने का वादा कर दिया हो। वे तेजी से घर की ओर भागे। बैलगाड़ी दिखाई दी, तो मन में खुशी की लहर दौड़ गई। उन्हें लगा कि अब देर नहीं होगी। पिता आएंगे, रुपये देंगे और वे अपने मित्रों के साथ मेले की ओर निकल जाएंगे।
लेकिन घर के बड़े लोग भी अपने काम की प्राथमिकताएं जानते थे। बैलगाड़ी में मलुआ भरा हुआ था। उसे उतारना जरूरी था। पैसे मांगने वाले बच्चों को साफ-साफ बता दिया गया, “पहले मलुआ उतरवाओ, फिर मेले के लिए रुपये मिलेंगे।” बच्चों के सामने कोई विकल्प नहीं था। मेले की राह में अब एक नया पड़ाव आ गया था...मलुआ उतारना। उन्होंने बिना बहस किए काम शुरू कर दिया। एक-एक बोरा, एक-एक गठरी और अनाज का हर हिस्सा गाड़ी से उतरने लगा। बच्चे कभी सामान पकड़ते, कभी उसे किनारे रखते और कभी बड़े लोगों के निर्देश पर उसे सही जगह पहुंचाते। उनकी आंखें बार-बार गाड़ी की ओर उठ जातीं। जैसे-जैसे गाड़ी खाली होती, उन्हें लगता कि मेले का रास्ता थोड़ा और खुल रहा है।
दूसरी ओर, वे बच्चे भी थे जिन्हें पहले ही रुपये मिल चुके थे। वे बैलगाड़ी के पास खड़े होकर बार-बार कहते, “जल्दी चलो! मेला निकल जाएगा!” उनकी यह बात सुनकर काम कर रहे बच्चों की बेचैनी और बढ़ जाती। बच्चों की दुनिया में समय का बोध भी कितना विचित्र होता है। परीक्षा के दिनों में एक घंटा बहुत लंबा लगता है, लेकिन मेले के दिन दस मिनट भी पहाड़ जैसे लगते हैं। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। धूप बढ़ती जा रही थी। माथे पर पसीना आने लगा था। उनकी धारीदार और चेक वाली कमीजों पर धूल और मलुआ के निशान पड़ गए थे। लेकिन किसी ने कपड़ों की चिंता नहीं की, क्योंकि आज कपड़ों से ज्यादा जरूरी था मेले तक पहुंचना।
इसी बीच बैलगाड़ी चलाकर लाने वाले एक सज्जन को प्यास लगी। वे धूप में थके हुए थे। काम के दौरान उन्होंने प्यार से, लेकिन कुछ सख्ती के साथ, एक बच्चे को पैना (बैलों को हांकने वाली छड़ी) से हल्का-सा छुआ दिया। बच्चा तुरंत बिलबिला के खिसक गया। उस क्षण उसके मन में गुस्सा भी आया हो, लेकिन दोस्ती की अपनी मजबूरी थी। उसका एक यार अभी वहीं था। वह उसे अकेला छोड़कर कैसे चला जाता? इसलिए वह धूप में खड़ा अपने मित्र का इंतजार करता रहा। उसके लिए उस दिन मेले तक पहुंचना जितना जरूरी था, उतना ही जरूरी था दोस्त के साथ पहुंचना। बचपन की दोस्ती का यही तो सौंदर्य है। कभी एक खिलौने के लिए झगड़ा, कभी एक मिठाई के लिए नाराजगी, और कभी किसी दोस्त के इंतजार में अपनी सारी जल्दी भूल जाना। आखिरकार बैलगाड़ी खाली हो गई। बच्चों की परीक्षा का पहला चरण पूरा हुआ।
अब सुबह के नौ बज चुके थे। धूप तेज हो रही थी। बच्चों को भूख भी लगने लगी थी, लेकिन उस समय भूख का मुकाबला केवल एक चीज कर सकती थी...मेले की उत्सुकता। बैलगाड़ी खाली होने के बाद बच्चे अपने-अपने परिजनों के पीछे चल दिए। अब उन्हें उम्मीद थी कि पैसे मिलने में देर नहीं लगेगी। लगभग साढ़े नौ बजे तक उनके हाथों में रुपये आ गए। रुपये छोटे थे, लेकिन खुशी बड़ी थी। जिन बच्चों को दस रुपये मिले, उनके लिए दस रुपये ही दुनिया थे। जिनके हाथ में बीस रुपये आए, वे अपने मन में कई खरीदारी की योजनाएं बनाने लगे। किसी ने सोचा कि पहले बांसुरी खरीदेगा, फिर मिठाई खाएगा। किसी ने तय किया कि घर लौटते समय बहन के लिए कुछ जरूर ले जाएगा। कोई अपने मित्रों के साथ मिलकर खिलौनों की दुकान पर जाने वाला था।
लेकिन पैसे देने के साथ बड़ों ने अपनी चेतावनी भी दे दी, “किसी से लड़ाई-झगड़ा मत करना। अगर किसी से झगड़ा किया, तो समझ लेना!” बच्चों ने सिर हिलाकर हामी भर दी। उस समय उनकी सहमति बिल्कुल सच्ची भी रही होगी। आखिर कौन बच्चा मेले जाने से पहले डांट खाना चाहता है? लेकिन बचपन की एक खासियत यह भी है कि वह भविष्य के अनुशासन से अधिक वर्तमान की खुशी में जीता है। उस समय बच्चों को यह नहीं मालूम था कि मेले में कौन किससे टकरा जाएगा, कौन किस खिलौने पर मोहित हो जाएगा और किसकी जेब से रुपये खर्च होने के बाद उसे अचानक याद आएगा कि घर लौटते समय भाई के लिए भी कुछ ले जाना था। अभी तो बस रुपये हाथ में थे और रुपये हाथ में आने का सुख उस दौर में किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं था।
आज की पीढ़ी शायद उस आनंद को पूरी तरह न समझ सके। आज बच्चे डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन खरीदारी और एक क्लिक में सामान मंगाने की दुनिया में बड़े हो रहे हैं। उनकी इच्छाओं और साधनों के बीच की दूरी बहुत कम हो गई है। लेकिन उस समय इच्छा और उपलब्धि के बीच इंतजार था, मेहनत थी, घरवालों की अनुमति थी और जब अंततः रुपये हाथ में आते थे, तो वे केवल खर्च करने की वस्तु नहीं रहते थे। वे पूरे दिन की खुशी का आधार बन जाते थे। मनुष्य की खुशी का संबंध हमेशा वस्तु की कीमत से नहीं होता। कई बार उसका संबंध उस वस्तु को पाने में लगे समय, प्रतीक्षा और प्रयास से होता है। शायद इसीलिए बचपन के वे दस रुपये आज की बड़ी रकम से भी ज्यादा याद आते हैं।
सुबह के लगभग नौ बजकर पैंतीस मिनट हो चुके थे। अब बच्चों के पास पैसे थे। उनके चेहरे पर फिर से वही चमक लौट आई थी, जो सुबह कुएं पर नहाते समय दिखाई दी थी। वे अपने-अपने घरों से मेले की ओर निकल पड़े। गांव की पगडंडियों पर उनकी चाल में एक नया उत्साह था। कोई आगे निकलने की कोशिश करता, तो कोई पीछे छूटे मित्र को आवाज देता। कोई रास्ते में मिलने वाले परिचित से मेले की बात करता, तो कोई अपनी जेब में रखे रुपये को बार-बार छूकर देखता। उन रुपयों को सुरक्षित रखना भी एक जिम्मेदारी थी। जेब छोटी थी और सपने बड़े।
रास्ते में उन्हें कुछ लोग मेले से लौटते दिखाई दिए। किसी के हाथ में रंगीन गुब्बारा था, कोई बांसुरी बजाता हुआ आ रहा था और किसी के हाथ में लकड़ी की तीन पहियों वाली गाड़ी थी। बस, फिर क्या था! उन बच्चों के कदम और तेज हो गए। गुब्बारा लेकर लौटता बच्चा उन्हें ऐसा दिखाई दे रहा था, जैसे वह किसी दूसरे ही संसार से होकर आया हो। बांसुरी की आवाज उनके कानों तक पहुंचती, तो वे कुछ क्षण के लिए रुक जाते। वे लौटते हुए लोगों को देखते और कल्पना करते कि थोड़ी देर बाद वे भी इसी तरह खिलौने लेकर गांव लौटेंगे। किसी के हाथ में बांसुरी होगी, किसी के हाथ में गुब्बारा, किसी की जेब में बचाए हुए दो-चार रुपये होंगे, जिन्हें वह घर पहुंचकर गर्व से दिखाएगा। और किसी के पास शायद कोई खिलौना नहीं होगा, लेकिन मेले की ऐसी कहानी होगी जिसे वह अगले कई दिनों तक अपने मित्रों को सुनाता रहेगा।
बच्चे श्री कैलाश जी के ट्यूबवेल तक पहुंच चुके थे। वहां से आगे बढ़ते हुए वे मेले की दिशा में मस्ती से जा रहे थे। अब उनके मन में पैसे मिलने की चिंता नहीं थी। घर के काम की बाधा पीछे छूट चुकी थी। उन्हें लगता था कि आज का दिन उनके नाम है। लेकिन गांव के रास्ते हमेशा सीधे नहीं होते। और बचपन की यात्राओं में अचानक आने वाले छोटे-छोटे प्रसंग ही बाद में सबसे बड़ी याद बन जाते हैं।
तभी गांव की ओर से खलखला बजने की आवाज सुनाई दी। बच्चे ठिठक गए। यह आवाज उनके लिए अपरिचित नहीं थी। ग्रामीण जीवन में बैलगाड़ियों और खेती से जुड़ी अनेक ध्वनियां थीं, जिनसे बच्चे सहज ही परिचित हो जाते थे। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। एक बैलगाड़ी उनकी ओर आ रही थी। गाड़ी खाली थी। बच्चों को लगा कि इससे अच्छी सवारी और क्या होगी! पैदल चलने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी और मेले तक पहुंचने में समय भी बचेगा। कुछ ही क्षण में वे पीछे से बैलगाड़ी पर चढ़ने लगे। एक बच्चा चढ़ा, फिर दूसरा, फिर तीसरा। लेकिन सभी के बैठते ही गाड़ी उलार हो गई। गाड़ी वालों ने पैना फटकारा और देखते ही देखते बच्चे नौ-दो-ग्यारह! जिस उत्साह से वे बैलगाड़ी पर चढ़े थे, उससे भी अधिक तेजी से नीचे उतर आए। किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके लिए उस समय एक ही लक्ष्य था...मेले तक पहुंचना, बिना किसी अतिरिक्त डांट के।
यह घटना भले ही कुछ क्षणों की रही हो, लेकिन उस उम्र में यही तो रोमांच था। न किसी टिकट की जरूरत, न किसी योजना की। रास्ते में बैलगाड़ी मिल जाए तो सवारी करने की कोशिश, साइकिल मिल जाए तो पीछे बैठने का अवसर और यदि कोई डांट दे, तो कुछ दूर जाकर फिर हंसने लगना। आज शायद कोई बच्चा ऐसी शरारत करे, तो उसे सड़क सुरक्षा, यातायात नियम और सार्वजनिक अनुशासन पर लंबा भाषण सुनना पड़े। और यह उचित भी है, क्योंकि चलती बैलगाड़ी पर अचानक चढ़ना खतरनाक हो सकता है। लेकिन उस समय की यादों में यह घटना गांव के बच्चों की बेफिक्र प्रकृति और मेले तक पहुंचने की जल्दबाजी का हिस्सा बनकर रह गई। बच्चे फिर पैदल चलने लगे। अब वे मुनेश जी के रहट तक पहुंच चुके थे। मेले की दूरी कम हो रही थी और उसके साथ ही उनकी कल्पनाओं की दुनिया और बड़ी होती जा रही थी।
इसी बीच गांव की ओर से दयाशंकर शर्मा उर्फ करू, जिन्हें लोग होली वाले करू के नाम से भी जानते थे, साइकिल पर आते दिखाई दिए। वे भी मेले की ओर जा रहे थे। बच्चों के लिए यह एक और अवसर था। उनमें से एक ने आव देखा न ताव, दौड़कर साइकिल के पीछे जगह बना ली और सवार हो गया। लेकिन साइकिल की अपनी सीमा थी। पीछे अचानक वजन बढ़ने से उसका संतुलन बिगड़ गया। अगले ही क्षण...छपाक! साइकिल भरा में जा गिरी। पानी उछला। साइकिल का संतुलन बिगड़ा। सवार को संभलने का अवसर मिला, लेकिन घटना हो चुकी थी। बच्चे के चेहरे पर क्या भाव रहे होंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। एक ओर मेले की जल्दी, दूसरी ओर अपनी शरारत से पैदा हुई मुसीबत।
ऐसी स्थिति में अक्सर बड़े लोग नाराज हो जाते हैं। कोई डांटता है, कोई दो-चार कड़वे शब्द कह देता है और कभी-कभी बात हाथापाई तक पहुंच जाती है। लेकिन उस दिन करू ने स्वयं पर काबू रखा। उन्होंने साइकिल उठाई, उसे संभाला और फिर मेले की दिशा में चल दिए। उन्होंने ज्यादा कुछ नहीं कहा। बच्चों ने भी शायद राहत की सांस ली होगी। कुछ क्षण पहले तक जो घटना उन्हें रोमांचक लगी थी, अब वह उनके लिए सबक बन चुकी थी। हालांकि बच्चों के सबक भी अजीब होते हैं। वे हर गलती से सीखते जरूर हैं, लेकिन अगली शरारत के लिए उनका उत्साह कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। करू आगे निकल गए। बाकी बच्चे फिर अपनी टोली में शामिल हो गए। किसी ने घटना पर कुछ कहा होगा, किसी ने हंसी दबाई होगी और किसी ने शायद यह सोचकर चुप रहना बेहतर समझा होगा कि कहीं बात घर तक न पहुंच जाए। लेकिन अब उनके पास इन बातों पर अधिक समय गंवाने का अवसर नहीं था, क्योंकि मेले की आवाजें पास आने लगी थीं।
सुबह के दस बजने वाले थे। बच्चे अब मेले से ज्यादा दूर नहीं थे। हवा में एक अलग ही हलचल थी। दूर से लाउडस्पीकर की आवाज सुनाई देने लगी थी। धार्मिक आयोजन की ध्वनियां गांव की सामान्य सुबह से अलग एक उत्सव का संकेत दे रही थीं। और फिर आई वह खुशबू, जिसे वे पहचानते थे—ताजे-ताजे मलपुओं की भीनी-भीनी महक! खाने की खुशबू का बचपन से गहरा संबंध होता है। किसी पुराने पकवान की सुगंध वर्षों बाद भी मनुष्य को एक विशेष समय और स्थान में पहुंचा सकती है। उस सुबह बच्चों के लिए मलपुओं की खुशबू केवल भोजन का संकेत नहीं थी। वह इस बात का प्रमाण थी कि उनका इंतजार अब समाप्त होने वाला है।
मेले में दुकानें सज चुकी थीं। लोग आने-जाने लगे थे। लाउडस्पीकर पर आवाजें गूंज रही थीं। कहीं धार्मिक कथा का वातावरण था, तो कहीं खिलौनों और मिठाइयों की दुनिया बच्चों को अपनी ओर बुला रही थी। बच्चों ने अपनी चाल तेज कर दी। उनकी आंखों के सामने अब केवल बाग था। वह बाग, जिसके बारे में वे कई दिनों से बातें कर रहे थे। वह बाग, जहां जाने के लिए उन्होंने सुबह-सुबह स्नान किया था, बालों में सरसों का तेल लगाया था, अपनी सबसे अच्छी कमीज पहनी थी, मलुआ उतरवाया था और रास्ते में बैलगाड़ी तथा साइकिल पर चढ़ने की शरारतें की थीं।
उनकी जेबों में रखे रुपये अब केवल रुपये नहीं थे। वे प्रतीक्षा का पुरस्कार थे। वे बचपन की स्वतंत्रता का छोटा-सा प्रतीक थे। वे उस दिन की शुरुआत थे, जिसे वे वर्षों तक याद रखने वाले थे। और शायद उन्हें उस समय यह भी नहीं मालूम था कि एक दिन यही छोटी-छोटी घटनाएं उनकी स्मृतियों में लौटेंगी और वे समझ पाएंगे कि जीवन की सबसे बड़ी खुशियां अक्सर बहुत साधारण क्षणों में छिपी होती हैं। एक गांव, एक बाग, एक मेला, कुछ दोस्त, जेब में मुट्ठी भर रुपये और आंखों में अनगिनत सपने।
बच्चे अब डोंडा वाले बाग के लगभग सामने थे। लाउडस्पीकर की आवाज और साफ सुनाई दे रही थी। मलपुओं की खुशबू अब पहले से अधिक गहरी थी। मेले की ओर जाते लोगों की भीड़ बढ़ रही थी। उनके कदमों में तेजी थी, चेहरों पर उत्साह था और मन में एक ही सवाल था...सबसे पहले किस दुकान पर जाएंगे?
इस सवाल का जवाब अब उन्हें मिलने ही वाला था, क्योंकि डोंडा वाला बाग सामने था और मेले की असली कहानी अब शुरू होने वाली थी।

क्रमशः...

✍️...रघुनाथ सिंह 

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