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ईरान में धधकता संकट: विश्व विवेक की कठिन परीक्षा

इतिहास केवल पहले की घटनाओं का ही संग्रह नहीं होता, वह वर्तमान को समझने और भविष्य को चेताने का दर्पण भी होता है। जब-जब अहंकार में सत्ता ने स्वयं को आम जनता से ऊपर रखा है, जब-जब शासकों ने, राजनेताओं ने, संवाद के बजाय दमन को चुना है, तब-तब देशों ने बहुत भारी कीमत चुकाई है। आज ईरान उसी खतरनाक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। वहाँ जो कुछ घट रहा है, वह केवल एक आंतरिक राजनीतिक संकट नहीं, अपितु एक ऐसा घटनाक्रम है जिसके दूरगामी प्रभाव समूची धरा को प्रभावित कर सकते हैं। भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे जुड़ी मानवीय, आर्थिक और रणनीतिक चिंताएँ सीधे हमारे राष्ट्रीय हितों से जुड़ी हैं।

ईरान में मौजूदा अस्थिरता की जड़ें उस शासन व्यवस्था में हैं, जो वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अस्तित्व में आई। अयातुल्लाह खामेनेई द्वारा स्थापित वैचारिक ढाँचा आज भी सत्ता की रीढ़ बना हुआ है। समय के साथ यह व्यवस्था जनता की आकांक्षाओं से दूर होती चली गई। शासन की वैधता जनसमर्थन से नहीं, बल्कि क़ानून, बल और भय से सुनिश्चित की जाने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि आम नागरिक की समस्याएँ (महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा और स्वास्थ्य) नीतिगत प्राथमिकताओं से बाहर होती चली गईं।

आज ईरान की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है। महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ चुकी है। युवाओं में बेरोज़गारी व्यापक है, जबकि उच्च शिक्षित वर्ग भी भविष्य को लेकर अनिश्चित है। यह विडंबना ही है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक रखने वाला देश अपनी आर्थिक क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहा। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने उद्योग, व्यापार और बैंकिंग व्यवस्था को पंगु बना दिया है, वहीं भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता ने आंतरिक समस्याओं को और गहरा कर दिया है।

इस घरेलू असंतोष को दबाने के लिए राज्य ने सख़्ती का रास्ता अपनाया है। नैतिक पुलिसिंग, महिलाओं पर नियंत्रण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियाँ, इंटरनेट बंद करना और पत्रकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी, ये सब अब अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। विरोध प्रदर्शन बार-बार उभरते हैं और उतनी ही बेरहमी से कुचल दिए जाते हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि जब असंतोष को सुना नहीं जाता, तो वह शांत नहीं होता, बल्कि और अधिक उग्र रूप में लौटता है।

ईरान का यह आंतरिक संकट अब अंतरराष्ट्रीय टकराव में बदलता जा रहा है। अमेरिका लंबे समय से ईरान को अपने हितों के लिए खतरा मानता रहा है। प्रतिबंधों, चेतावनियों और सैन्य तैनाती के ज़रिए वाशिंगटन ने दबाव बढ़ा दिया है। दूसरी ओर चीन और रूस ने ईरान के साथ अपने रिश्ते मज़बूत किए हैं। उनके लिए ईरान ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव और अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने का एक अहम केंद्र है। इस प्रकार ईरान आज वैश्विक शक्ति-संतुलन की राजनीति का अखाड़ा बनता जा रहा है।

भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। ऐतिहासिक रूप से भारत और ईरान के संबंध सांस्कृतिक, सभ्यतागत और व्यापारिक रहे हैं। ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज़ से भी ईरान भारत के लिए महत्वपूर्ण रहा है। चाबहार बंदरगाह परियोजना को भारत ने केवल एक व्यापारिक उपक्रम के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संपर्क और रणनीतिक संतुलन के साधन के रूप में देखा था। यह परियोजना भारत को अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ने का वैकल्पिक मार्ग प्रदान करती है।

लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों ने भारत की संभावनाओं को सीमित कर दिया है। अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी आज एक अहम वास्तविकता है। ऐसे में भारत के लिए ईरान के साथ खुले तौर पर खड़ा होना आसान नहीं है। यही कारण है कि नई दिल्ली एक अत्यंत सावधानीपूर्ण और संतुलित नीति अपना रही है। भारतीय नागरिकों को ईरान छोड़ने की सलाह इसी सतर्कता का संकेत है।

अनुमान है कि आज भी क़रीब 10 हज़ार भारतीय ईरान में फंसे हुए हैं। इनमें छात्र, धार्मिक तीर्थयात्री, व्यापारी, इंजीनियर और पर्यटक शामिल हैं। इनके लिए यह संकट किसी भू-राजनीतिक सिद्धांत का विषय नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सुरक्षा, आजीविका और जीवन से जुड़ा प्रश्न है। किसी भी जिम्मेदार राज्य के लिए अपने नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि होती है, और इस कसौटी पर भारत को कठिन निर्णय लेने पड़ रहे हैं।

क्षेत्रीय स्तर पर भी खतरे कम नहीं हैं। होरमुज़ जलडमरूमध्य में यदि तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ेगा। दुनिया का लगभग पाँचवां हिस्सा तेल इसी मार्ग से गुजरता है। भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है। तेल की कीमतों में ज़रा-सी बढ़ोतरी भी महंगाई और आर्थिक स्थिरता पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह संकट कहीं व्यापक सैन्य टकराव में न बदल जाए। यदि अमेरिका, रूस और चीन जैसे शक्तिशाली देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने आते हैं, तो उसके परिणाम केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेंगे। वैश्विक अर्थव्यवस्था, जो पहले ही महामारी, युद्ध और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रही है, एक और बड़े झटके को सहन करने की स्थिति में नहीं है। इतिहास गवाह है कि बड़े युद्धों का सबसे अधिक नुकसान आम जनता और विकासशील देशों को उठाना पड़ता है।

भारत की विदेश नीति की बुनियाद संवाद, संतुलन और शांति पर टिकी रही है। पंचशील सिद्धांत, गुटनिरपेक्ष आंदोलन और आज की रणनीतिक स्वायत्तता, इन सबका मूल भाव यही रहा है कि संघर्ष का समाधान बातचीत से निकलता है, न कि बल प्रयोग से। ईरान संकट के संदर्भ में भी भारत का दृष्टिकोण यही होना चाहिए और यही संदेश दुनिया को दिया जाना चाहिए।

विश्व नेताओं के सामने आज एक कठिन लेकिन स्पष्ट विकल्प है। वे या तो सत्ता, अहंकार और टकराव की राजनीति को आगे बढ़ाएँ, या फिर संवाद, संयम और सहयोग का रास्ता अपनाएँ। ईरान को अलग-थलग करना समस्या का समाधान नहीं है। सुधार, समावेशन और बातचीत ही स्थायी स्थिरता की ओर ले जा सकती है।

ईरान में लगी आग केवल एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह पूरी मानवता के लिए चेतावनी है। यह चेतावनी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम इतिहास से कुछ सीखना चाहते हैं या फिर उसी रास्ते पर दोहराव के साथ चलने को तैयार हैं। आने वाले समय में लिए गए फैसले तय करेंगे कि यह संकट वैश्विक विनाश की भूमिका बनेगा या फिर सामूहिक विवेक और कूटनीति की जीत का उदाहरण। भारत के दृष्टिकोण से उत्तर स्पष्ट है, शांति, संवाद और सह-अस्तित्व ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है।


रघुनाथ यादव

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