सन् 1991 भारत के राजनीतिक इतिहास का वह मोड़ था, जिसने देश की दिशा और दशा दोनों को बदल दिया। यह केवल एक आम चुनाव का वर्ष नहीं था, बल्कि यह वह समय था जब राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और संस्थागत सुधार एक साथ सामने आए। इस दौर को समझने के लिए हमें इसे केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से देखना होगा, जहाँ नेतृत्व, चुनाव प्रणाली और नीतिगत बदलावों ने मिलकर एक नए भारत की नींव रखी।
1980 के दशक के अंत तक भारतीय राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देने लगा था। लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी की पकड़ कमजोर होने लगी थी और गठबंधन राजनीति का उदय हो रहा था। 1989 के चुनावों में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनी, लेकिन यह सरकार विभिन्न विचारधाराओं के सहारे खड़ी थी, जिससे स्थिरता की कमी बनी रही। वी.पी. सिंह की सरकार अधिक समय तक नहीं चल सकी और उसके बाद चंद्रशेखर की सरकार भी कांग्रेस के समर्थन पर निर्भर थी, जो अंततः गिर गई। इस राजनीतिक अस्थिरता ने देश में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया।
इसी बीच 1991 के आम चुनाव की घोषणा हुई, लेकिन चुनावी प्रक्रिया के दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे देश को हिला दिया। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 21 मई 1991 को एक आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई। इस घटना ने न केवल चुनावी माहौल को भावनात्मक बना दिया, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित किया। चुनाव कई चरणों में कराए गए और सुरक्षा व्यवस्था को अत्यंत कड़ा किया गया।
इन परिस्थितियों में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और पी. वी. नरसिम्हा राव ने 21 जून 1991 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। राव का नेतृत्व शांत, व्यावहारिक और दूरदर्शी था। उन्होंने बिना अधिक शोर-शराबे के ऐसे निर्णय लिए, जिन्होंने भारत की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को नई दिशा दी। उनके नेतृत्व में एक नई सोच विकसित हुई, जिसमें परंपरागत समाजवादी मॉडल से हटकर व्यावहारिक और वैश्विक दृष्टिकोण को अपनाया गया।
इसी समय चुनावी व्यवस्था में भी एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला, जिसका श्रेय मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन को जाता है। 1990 से 1996 तक अपने कार्यकाल में शेषन ने भारतीय चुनाव प्रणाली को पूरी तरह बदलकर रख दिया। पहले चुनाव आयोग को एक निष्क्रिय संस्था माना जाता था, लेकिन शेषन ने इसे एक सशक्त और सक्रिय संस्था में बदल दिया।
शेषन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान मतदाता पहचान पत्र (EPIC) की शुरुआत था। इससे फर्जी मतदान और प्रतिरूपण जैसी समस्याओं पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया। प्रत्येक मतदाता की पहचान सुनिश्चित होने लगी, जिससे चुनावों की पारदर्शिता बढ़ी। इसके अलावा, उन्होंने आदर्श आचार संहिता (MCC) को सख्ती से लागू किया। पहले यह केवल एक औपचारिक नियम था, लेकिन शेषन ने इसे प्रभावी बनाकर राजनीतिक दलों को नियमों का पालन करने के लिए बाध्य किया।
शेषन ने चुनावी कदाचारों पर भी कड़ी कार्रवाई की। उन्होंने लगभग 150 प्रकार के चुनावी अपराधों की पहचान की, जिनमें बूथ कैप्चरिंग, वोट खरीदना, धमकी देना और अत्यधिक खर्च शामिल थे। इन सभी पर सख्त नियंत्रण किया गया। केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती ने चुनावों को अधिक सुरक्षित और निष्पक्ष बनाया। उनके प्रयासों ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को नई ऊँचाई पर पहुँचा दिया और लोकतंत्र को मजबूत किया।
1991 के चुनाव इन सुधारों के कारण अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बने। हालांकि मतदान प्रतिशत थोड़ा कम था, लेकिन यह अधिक वास्तविक और ईमानदार भागीदारी को दर्शाता था। यह वह समय था जब भारतीय लोकतंत्र ने खुद को नए रूप में स्थापित किया।
इसी दौरान देश एक गंभीर आर्थिक संकट से भी जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो चुका था और देश केवल दो सप्ताह के आयात के लिए ही सक्षम था। राजकोषीय घाटा बढ़ चुका था और महंगाई दोहरे अंकों में पहुँच गई थी। खाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतों में वृद्धि ने स्थिति को और गंभीर बना दिया था। ऐसे में भारत को IMF और विश्व बैंक से सहायता लेनी पड़ी।
प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मिलकर इस संकट से निपटने के लिए ऐतिहासिक निर्णय लिए। सबसे पहले रुपये का अवमूल्यन किया गया, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिला। इसके बाद भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर आपातकालीन ऋण प्राप्त किया। यह निर्णय भले ही कठिन था, लेकिन देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए आवश्यक था।
इसके साथ ही नई आर्थिक नीति लागू की गई, जिसे LPG मॉडल के नाम से जाना जाता है—उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण। उदारीकरण के तहत सरकार ने उद्योगों पर से नियंत्रण हटाए और लाइसेंस राज को समाप्त किया। इससे निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिला और प्रतिस्पर्धा बढ़ी। निजीकरण के तहत सार्वजनिक उपक्रमों में सरकार की हिस्सेदारी कम की गई और निजी निवेश को प्रोत्साहित किया गया। वैश्वीकरण के माध्यम से भारत को वैश्विक बाजार से जोड़ा गया और विदेशी निवेश को आकर्षित किया गया।
इन सुधारों का भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। आर्थिक विकास दर में वृद्धि हुई, विदेशी निवेश बढ़ा और नए उद्योगों का विकास हुआ। आईटी और सेवा क्षेत्र में क्रांति आई और भारत वैश्विक स्तर पर एक मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा। हालांकि इसके साथ कुछ चुनौतियाँ भी आईं, जैसे आय असमानता में वृद्धि और ग्रामीण क्षेत्रों की उपेक्षा।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो 1991 के सुधारों ने राज्य और नागरिक के संबंधों को भी बदल दिया। सरकार की भूमिका एक नियंत्रक से बदलकर एक सहयोगी की हो गई। बाजार शक्तियों को अधिक महत्व मिला और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को स्वीकार किया गया। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच में भी परिवर्तन का संकेत था।
अंततः 1991 का वर्ष भारतीय इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ। यह वह समय था जब लोकतंत्र ने अपनी मजबूती दिखाई, संस्थाओं ने अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित किया और नेतृत्व ने कठिन परिस्थितियों में भी साहसिक निर्णय लिए। टी. एन. शेषन के चुनावी सुधारों और पी. वी. नरसिम्हा राव के आर्थिक निर्णयों ने मिलकर भारत को एक नई दिशा दी।
यह कहा जा सकता है कि 1991 केवल एक वर्ष नहीं था, बल्कि एक युग की शुरुआत थी, एक ऐसा युग जिसमें भारत ने खुद को बदलने का साहस दिखाया और दुनिया के सामने एक नई पहचान बनाई।
Raghunath Singh
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