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भारतीय संस्कृति मानव के विकास का आध्यात्मिक आधार बनाती है

हमारी संस्कृति में जन्म के पूर्व से मृत्यु के पश्चात् तक मानवी चेतना को संस्कारित करने का क्रम निर्धारित है । भारतीय संस्कृति हमारी मानव जाति के विकास का उच्चतम स्तर कही जा सकती है। 

इसी की परिधि में सारे विश्वराष्ट्र के विकास के वसुधैव कुटुम्बकम् के सारे सूत्र आ जाते हैं । मनुष्य में पशुता के संस्कार उभरने न पाये।  यह इसका एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है। और मनुष्य में संतए सुधारकए शहीद की मनोभूमि विकसित कर उसे मनीषीए ऋषिए महामानवए देवदूत स्तर तक विकसित करने की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर लेती है। सदा से ही भारतीय संस्कृति महापुरुषों को जन्म देती आयी है व यही हमारी सबसे बड़ी धरोहर है। 

भारतीय संस्कृति की अन्यान्य विशेषताओं सुख का केन्द्र आंतरिक श्रेष्ठताए अपने साथ कड़ाईए औरों के प्रति उदारताए विश्वहित के लिए स्वार्थों का त्यागए अनीतिपूर्ण नहीं । नीतियुक्त कमाई पारस्परिक सहिष्णुताए स्वच्छता. शुचिता का दैनन्दिन जीवन में पालनए परिवार व राष्ट्र् के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी का परिपालनए अनीति से लड़ने संघर्ष करने का साहस. मन्युए पितरों की तृप्ति हेतु तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु स्थान. स्थान पर वृक्षारोपण कर हरीतिमा विस्तार तथा अवतारवाद का हेतु समझते हुए तदनुसार अपनी भूमिका निर्धारण सभी पक्षों का बड़ा ही तथ्य सम्मत. तर्क विवेचन पूज्यवर ने इसमें प्रस्तुत किया है

साभार: AWGP

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