पत्रकारिता के विद्यार्थी अक्सर पढ़ते हैं कि समाचार क्या होता है। उन्हें सिखाया जाता है कि जिसे कोई छिपाना चाहता है, वही समाचार है, बाकी सब विज्ञापन है। लेकिन प्रेम के क्षेत्र में कुछ पुरुषों ने इस सिद्धांत को उल्टा कर दिया है। यहां जो बात दो लोगों के बीच छिपी रहनी चाहिए, वही सबसे पहले समाचार बना दी जाती है। जो स्मृतियां निजी होनी चाहिए, वे ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती हैं। जो संवाद सिर्फ दो दिलों के बीच होने चाहिए, वे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना दिए जाते हैं। और फिर वही लोग शिकायत करते हैं कि लड़कियां प्रेम से डरती हैं।
लड़कियां प्रेम से नहीं डरतीं। वे इस बात से डरती हैं कि कहीं उनका प्रेमी भविष्य में एक चलता-फिरता मीडिया हाउस न निकल जाए। प्रेम के समय वह व्यक्ति प्रेमी होता है, लेकिन ब्रेकअप के बाद अचानक संपादक, रिपोर्टर, पीआर एजेंट, कंटेंट क्रिएटर, डिजिटल मार्केटर और सोशल मीडिया मैनेजर सब कुछ बन जाता है। उसके पास पुरानी तस्वीरों का आर्काइव होता है, चैट्स का डेटाबेस होता है, निजी बातों की रिकॉर्डिंग होती है और सबसे खतरनाक चीज़ होती है...घायल अहंकार। मीडिया की भाषा में कहें तो उसके पास कंटेंट भी होता है और मोटिव भी।
पत्रकारिता का पहला नैतिक नियम है कि किसी स्रोत की पहचान सुरक्षित रखी जाए। लेकिन प्रेम की दुनिया में कुछ पुरुष ऐसे हैं जो रिश्ता टूटते ही अपने सबसे भरोसेमंद स्रोत का नाम, पता, फोटो और इतिहास सब सार्वजनिक कर देते हैं। यदि ये लोग कभी न्यूज़रूम में काम करते तो शायद पहले ही दिन नौकरी से निकाल दिए जाते। क्योंकि जो व्यक्ति अपने सबसे निजी स्रोत की गोपनीयता नहीं बचा सकता, वह पत्रकारिता के किसी नैतिक सिद्धांत का सम्मान कैसे करेगा?
दिलचस्प बात यह है कि प्रेम में असफल हुए कुछ पुरुषों का व्यवहार बिल्कुल वैसे ही होता है जैसे किसी चैनल की टीआरपी गिर गई हो। अचानक वे पुरानी फाइलें खोलने लगते हैं। एक्सक्लूसिव सामग्री खोजने लगते हैं। दस साल पुरानी तस्वीरें भी "बड़ी खबर" लगने लगती हैं। सोशल मीडिया पर पोस्ट डालते हैं, संकेत देते हैं, नाम लेते हैं, इंटरव्यू देते हैं, पॉडकास्ट करते हैं और फिर दावा करते हैं कि वे तो सिर्फ सच बता रहे हैं। यह वही तर्क है जो हर पीत पत्रकारिता अपने बचाव में देती है...जनता को जानने का अधिकार है।
जनता को जानने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कब से किसी स्त्री की निजी जिंदगी तक पहुंच गया? यह सवाल शायद उन लोगों से कभी नहीं पूछा जाता जो प्रेम को प्रेस रिलीज़ समझ बैठे हैं।
जनसंपर्क यानी पीआर का उद्देश्य किसी छवि को बेहतर बनाना होता है। लेकिन कुछ पुरुष ब्रेकअप के बाद जो पीआर अभियान चलाते हैं, उसका उद्देश्य अपनी छवि चमकाना और स्त्री की गरिमा को धूमिल करना होता है। वे दुनिया को बताना चाहते हैं कि देखो, कभी यह महिला मेरे साथ थी। मानो किसी महिला का साथ होना उनके व्यक्तित्व का प्रमाणपत्र हो। उनकी समस्या प्रेम का अंत नहीं होती, उनकी समस्या यह होती है कि दुनिया कहीं भूल न जाए कि कभी कोई महिला उन्हें पसंद करती थी।
डिजिटल मीडिया ने इस मानसिकता को और भी शक्तिशाली बना दिया है। पहले मोहल्ले में दस लोग जानते थे, अब एक पोस्ट लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। पहले अफवाह चौपाल तक सीमित रहती थी, अब फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब और व्हाट्सऐप उसे वैश्विक बना देते हैं। तकनीक ने संवाद को लोकतांत्रिक बनाया था, लेकिन कुछ लोगों ने उसे अपने अहंकार का लाउडस्पीकर बना लिया।
फेसबुक पर भावुक पोस्ट लिखी जाती है। इंस्टाग्राम पर पुरानी तस्वीरें डाली जाती हैं। एक्स पर संकेतों में बातें कही जाती हैं। यूट्यूब पर "मेरी सच्चाई" शीर्षक से वीडियो आते हैं। व्हाट्सऐप पर स्क्रीनशॉट घूमते हैं। और फिर वही व्यक्ति समाज से पूछता है...आजकल लड़कियां भरोसा क्यों नहीं करतीं?
यह प्रश्न वैसा ही है जैसे कोई विज्ञापन एजेंसी वर्षों तक झूठे दावे करे और फिर पूछे कि लोग विज्ञापनों पर भरोसा क्यों नहीं करते।
विज्ञापन और प्रेम में एक बुनियादी अंतर होता है। विज्ञापन का उद्देश्य ध्यान आकर्षित करना है, प्रेम का उद्देश्य विश्वास बनाना है। लेकिन कुछ लोग प्रेम को भी विज्ञापन अभियान की तरह चलाते हैं। जब तक रिश्ता चलता है, वे ब्रांड एंबेसडर बने रहते हैं। रिश्ता खत्म होते ही वे नकारात्मक प्रचार शुरू कर देते हैं। जैसे कोई कंपनी अपने पुराने उत्पाद के खिलाफ अभियान चला रही हो।
विडंबना यह है कि ऐसे लोग स्वयं को पीड़ित बताते हैं। वे कहते हैं कि उनका दिल टूट गया। यह संभव है कि सचमुच टूटा हो। लेकिन दिल टूटना और चरित्र टूटना दो अलग बातें हैं। दिल टूटने पर आदमी दुखी होता है। चरित्र टूटने पर आदमी दूसरों को दुखी करने लगता है।
मीडिया अध्ययन में एक शब्द है...फ्रेमिंग। यानी किसी घटना को किस दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाए। कुछ पुरुष अपनी पूरी प्रेम कहानी को ऐसे फ्रेम करते हैं कि वे हमेशा नायक दिखें और महिला हमेशा खलनायिका। वे कहानी नहीं बताते, वे संपादन करते हैं। वे तथ्य नहीं रखते, वे नैरेटिव बनाते हैं। और चूंकि उनके पास माइक्रोफोन होता है, फॉलोअर्स होते हैं या सोशल मीडिया अकाउंट होता है, इसलिए उनकी आवाज़ अधिक सुनाई देती है।
लेकिन सच यह है कि प्रेम कोई टीवी डिबेट नहीं है जिसमें एक पक्ष लगातार बोलता रहे और दूसरा पक्ष चुप बैठा रहे। प्रेम का सबसे बड़ा मूल्य संवाद नहीं, सम्मान है। और सम्मान का अर्थ है कि रिश्ता समाप्त होने के बाद भी आप दूसरे व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करें।
आज की डिजिटल संस्कृति में कंटेंट सबसे बड़ा देवता बन गया है। हर चीज़ कंटेंट है। खाना कंटेंट है, यात्रा कंटेंट है, शादी कंटेंट है, दुख कंटेंट है। कुछ लोगों ने प्रेम को भी कंटेंट बना दिया है। वे प्रेम इसलिए नहीं करते कि किसी से जुड़ सकें। वे प्रेम इसलिए करते हैं कि भविष्य में उनके पास सुनाने के लिए कहानी हो।
स्त्रियां इसी मानसिकता से डरती हैं। उन्हें डर है कि कहीं उनका विश्वास किसी दिन किसी की वायरल पोस्ट का शीर्षक न बन जाए। कहीं उनकी मुस्कान किसी की लोकप्रियता का साधन न बन जाए। कहीं उनका निजी संवाद किसी सार्वजनिक बहस का हिस्सा न बन जाए।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो पुरुष सबसे ज्यादा प्रेम का प्रदर्शन करते हैं, अक्सर वही प्रेम की गोपनीयता का सबसे कम सम्मान करते हैं। उन्हें प्रेमिका नहीं चाहिए, उन्हें दर्शक चाहिए। उन्हें रिश्ता नहीं चाहिए, उन्हें ऑडियंस चाहिए। उन्हें विश्वास नहीं चाहिए, उन्हें व्यूज़ चाहिए।
और यही कारण है कि आज प्रेम की दुनिया में सबसे विश्वसनीय व्यक्ति वह नहीं है जो दिन में सौ बार "आई लव यू" कहता है। सबसे विश्वसनीय व्यक्ति वह है जो बिछड़ने के बाद भी आपकी कहानी को अपनी लोकप्रियता का साधन नहीं बनाता।
प्रेम का असली पत्रकार वह है जो सत्य जानकर भी चुप रहना जानता है। प्रेम का असली पीआर विशेषज्ञ वह है जो दूसरे की प्रतिष्ठा की रक्षा करे। प्रेम का असली डिजिटल नागरिक वह है जो लाइक, शेयर और फॉलोअर्स के लिए किसी के विश्वास का व्यापार न करे।
इसलिए लड़कियां प्रेम से नहीं डरतीं। वे उन पुरुषों से डरती हैं जिनके भीतर एक असफल प्रेमी से ज्यादा एक सफल प्रचारक छिपा बैठा है। वे उन लोगों से डरती हैं जो रिश्तों को नहीं जीते, उनका डॉक्यूमेंटेशन करते हैं। जो स्मृतियों को नहीं संजोते, उनका प्रसारण करते हैं। जो प्रेम को नहीं समझते, उसे प्रकाशित करते हैं। और शायद इसी युग का सबसे बड़ा नारीवादी वाक्य कोई क्रांतिकारी नारा नहीं, बल्कि एक साधारण-सा आश्वासन है...तुम निश्चिंत रहो, हमारा रिश्ता कभी कंटेंट नहीं बनेगा।
जिस दिन पुरुष यह वाक्य निभाने लगेंगे, उस दिन स्त्रियां प्रेम से नहीं, बल्कि प्रेम में अधिक विश्वास करने लगेंगी।
बस यूँही रघुनाथ
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