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कश्मीर और सिनेमा: अंधेरे से उजाले की ओर लौटती एक कहानी

अनुच्छेद 370 के हटने के बाद बदलता कश्मीर केवल राजनीतिक घटनाक्रम की कहानी नहीं है, यह सार्वजनिक जीवन, सांस्कृतिक गतिविधियों और राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ाव के बदलते परिदृश्य की कहानी भी है। ‘रंग-ए-सिनेमा’ जैसे आयोजन इसी परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अभिव्यक्ति हैं।

कश्मीर और सिनेमा का रिश्ता नया नहीं है। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों से ही घाटी में सिनेमा मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा रहा है। 1960 और 1970 के दशक में तो कश्मीर भारतीय सिनेमा की सबसे लोकप्रिय लोकेशनों में शामिल हो गया था। डल झील, शिकारे, बर्फ से ढके पहाड़, गुलमर्ग, पहलगाम और मुगल गार्डन केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं रहे, वे भारतीय दर्शकों की सामूहिक कल्पना में ‘कश्मीर’ की पहचान बन गए।

एक समय था जब कश्मीर में सिनेमाघरों के बाहर टिकट के लिए लंबी कतारें लगती थीं। फिल्म की शूटिंग की ख़बर मिलते ही स्थानीय लोग अपने पसंदीदा अभिनेता-अभिनेत्रियों की एक झलक पाने के लिए पहुंच जाते थे। सिनेमा तब केवल पर्दे पर चलने वाली कहानी नहीं था, बल्कि कश्मीर के सामाजिक जीवन का जीवंत हिस्सा था।

लेकिन 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक में परिस्थितियां तेजी से बदल गईं। आतंकवाद और हिंसा ने कश्मीर के सार्वजनिक जीवन को प्रभावित किया। सिनेमाघर बंद होते गए, सांस्कृतिक गतिविधियां सिमटती गईं और वह कश्मीर, जो कभी गीत-संगीत और प्रेम की सिनेमाई पृष्ठभूमि था, धीरे-धीरे संघर्ष, आतंक और राजनीतिक अस्थिरता की छवि से जुड़ने लगा।

सिनेमाघरों का बंद होना महज मनोरंजन के एक साधन का समाप्त होना नहीं था। यह उस सार्वजनिक सांस्कृतिक जीवन के सिकुड़ने का प्रतीक था जिसमें अलग-अलग समुदाय, पीढ़ियां और विचार एक साझा सामाजिक अनुभव का हिस्सा बनते थे। इसी दौर में पाक समर्थित आतंकवाद के कारण कश्मीरी पंडितों का विस्थापन हुआ और घाटी की सामाजिक स्मृति पर एक गहरा घाव पड़ा। घर छूटे, मोहल्ले बदले और अनेक सांस्कृतिक स्मृतियां बिखर गईं।

अनुच्छेद 370 के बाद बदलता परिदृश्य: 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव के बाद जम्मू-कश्मीर के सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले। इन परिवर्तनों को लेकर राजनीतिक और वैचारिक बहस अलग विषय है, लेकिन यह भी तथ्य है कि इसके बाद जम्मू-कश्मीर में पर्यटन, निवेश, सांस्कृतिक आयोजनों, खेल गतिविधियों और सार्वजनिक जीवन को लेकर एक नया वातावरण बनाने के प्रयास तेज हुए। सिनेमा भी इसी बदलते परिदृश्य का हिस्सा बना।

सितंबर 2022 में श्रीनगर में लगभग तीन दशकों के अंतराल के बाद नियमित सार्वजनिक सिनेमा की वापसी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना थी। मल्टीप्लेक्स का खुलना केवल फिल्म देखने की सुविधा उपलब्ध कराना नहीं था, यह उस पीढ़ी के लिए सार्वजनिक सांस्कृतिक अनुभव की वापसी थी जिसने अपने शहर में सिनेमाघर को लगभग इतिहास की वस्तु के रूप में ही जाना था।

अब 2026 में ‘रंग-ए-सिनेमा’ के रूप में जम्मू-कश्मीर का पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव इस यात्रा को एक और महत्वपूर्ण पड़ाव देता दिखाई देता है। 1,100 से अधिक फिल्म प्रविष्टियों में से 41 देशों की 135 फिल्मों का चयन यह संकेत देता है कि जम्मू-कश्मीर स्वयं को केवल फिल्मों की शूटिंग के लिए एक सुंदर लोकेशन के रूप में नहीं, अपितु वैश्विक सिनेमाई संवाद के एक संभावित केंद्र के रूप में भी स्थापित करना चाहता है।

कश्मीर केवल कैमरे के सामने नहीं, कैमरे के पीछे भी: अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि बॉलीवुड कश्मीर में वापस आएगा या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या कश्मीर अपनी कहानी स्वयं कहेगा? दशकों तक भारतीय सिनेमा ने कश्मीर को कभी प्रेम और सौंदर्य की भूमि के रूप में प्रस्तुत किया तो कभी आतंकवाद और संघर्ष के प्रतीक के रूप में। दोनों छवियों का अपना संदर्भ है, लेकिन कश्मीर इन दोनों से कहीं बड़ा है।

कश्मीर के गांव हैं, शहर हैं, लोककथाएं हैं, सूफी और संत परंपराएं हैं, शैव दर्शन है, साहित्य है, संगीत है, कारीगरी है, स्त्रियों की कहानियां हैं, युवाओं के सपने हैं, विस्थापन की पीड़ा है, आतंकवाद का दर्द है, और उन लोगों की स्मृतियां भी हैं जो अपनी जमीन से दूर कर दिए गए।

इसलिए आज आवश्यकता केवल ‘कश्मीर पर फिल्म’ बनाने की नहीं, अपितु कश्मीर के लोगों द्वारा कश्मीर की कहानियां कहने की है।

सिनेमा: पर्यटन से आगे, स्मृति का दस्तावेज: कश्मीर में सिनेमा की वापसी को केवल पर्यटन बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखना इसके व्यापक महत्व को सीमित करना होगा। सिनेमा किसी समाज की स्मृति को संरक्षित करने का माध्यम भी है।

एक फिल्म उस पुराने घर को यादों में जीवित रख सकती है, जो अब अस्तित्व में नहीं है। एक गीत किसी भूली हुई गली को नई पीढ़ी से परिचित करा सकता है। एक डॉक्यूमेंट्री उस व्यक्ति की कहानी दर्ज कर सकती है जिसकी आवाज इतिहास के शोर में दब गई। सिनेमा उन समुदायों को एक-दूसरे की स्मृतियों से परिचित करा सकता है जिनके अनुभव अलग-अलग रहे हैं।

यही वह स्थान है जहां सिनेमा मनोरंजन से आगे बढ़कर सामाजिक संवाद और सांस्कृतिक पुनर्स्मरण का माध्यम बन जाता है।

नई पीढ़ी के लिए नया कश्मीर: आज का कश्मीर उस दौर से आगे निकलने की कोशिश कर रहा है जिसमें उसकी पहचान केवल आतंकवाद, बंद और राजनीतिक अस्थिरता से निर्धारित होती थी। अनुच्छेद 370 के बाद हुए बदलावों ने इस पुनर्संरचना को राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर गति दी है, अब चुनौती है कि यह परिवर्तन सांस्कृतिक स्तर पर भी दिखाई दे।

सिनेमाघर, फिल्म महोत्सव, स्थानीय फिल्म निर्माण, साहित्यिक गतिविधियां, संगीत, कला और युवाओं की रचनात्मक भागीदारी इस सांस्कृतिक परिवर्तन को स्थायी बना सकती हैं।

‘रंग-ए-सिनेमा’ इसलिए केवल फिल्मों का उत्सव नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि कश्मीर फिर से अपने सार्वजनिक और सांस्कृतिक जीवन को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है।

कश्मीर की कहानी अब केवल किसी बाहरी फिल्मकार के कैमरे से नहीं कही जानी चाहिए। कश्मीर को स्वयं अपना कैमरा उठाना होगा। क्योंकि जिस कश्मीर को कभी हिंदी सिनेमा ने भारत की कल्पना में बसाया था, अब समय है कि कश्मीर स्वयं अपनी स्मृतियों, संघर्षों, विरासत और भविष्य की कहानी भारत और दुनिया को सुनाए। और शायद यही कश्मीर के सिनेमा की अगली यात्रा का सबसे सुंदर अध्याय होगा। एक ऐसे कश्मीर की कहानी, जो अतीत को भूलता नहीं, लेकिन भविष्य की ओर देखना सीख रहा है।


डॉ रघुनाथ सिंह 


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