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आधी रात का समय था। श्मशान के सन्नाटे में राजा विक्रमादित्य एक बार फिर बेताल को अपने कंधे पर लादकर चल पड़े। रास्ते में बेताल ने अपने चिरपरिचित अंदाज में हँसा और बोला, राजन! आज मैं आपको ऐसी पॉलिटिकल पार्टी की कहानी सुनाता हूँ, जिसके पास इतिहास तो है, लेकिन भविष्य को लेकर सवाल हैं, जिसके पास नेतृत्व तो है, लेकिन नेतृत्व की दिशा पर बहस है और जिसके पास विचारधारा तो इतनी है कि कभी-कभी विचार ही एक-दूसरे से पूछने लगते हैं...भाई, आखिर हम जा कहाँ रहे हैं?”
विक्रम ने गंभीर होकर कहा, "बेताल! पहेलियाँ बुझाने के बजाय सीधे कहानी बताओ।"
बेताल बोला, “अच्छा, तो सुनो राजन! यह कहानी है उस पार्टी की, जो देश की सबसे बड़ी-बूढ़ी है, जिसने कभी स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत सँभाली, देश पर लंबे समय तक शासन किया और अपने आपको भारत की राजनीति का स्वाभाविक केंद्र समझता रहा। लेकिन समय बदला, मतदाता बदले, राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं और उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया...विरासत के सहारे कब तक भविष्य की राजनीति की जा सकती है?”
विक्रम बोले, “तुम कांग्रेस की बात कर रहे हो?”
बेताल ने मुस्कराते हुए अपनी आँखें मटकाईं, “राजन! तुम तो नाम सुनते ही पहचान गए। लगता है, इस पहेली का उत्तर तुम्हें पहले से मालूम है। मगर ठहरो, असली पिक्चर अभी बाकी है।”
बेताल ने बोलना शुरू किया, “राजन! राजनीति में विचारधारा का अपना महत्त्व है। कोई दल समाजवाद की बात करता है, कोई राष्ट्रवाद की, कोई उदारवाद की और कोई वामपंथी विचारों से प्रेरणा लेता है। लेकिन जब कोई दल अलग-अलग विचारों को अपने भीतर समेटने की कोशिश करता है, तब कभी-कभी उसकी राजनीति एक ऐसी खिचड़ी बन जाती है, जिसमें चावल भी अपने हैं, दाल भी अपनी है, मसाले भी अपने हैं, मगर खाने वाला पूछ रहा है...महाराज, इसका स्वाद आखिर है कैसा?”
विक्रम मन ही मन मुस्कराए, “विविधता लोकतंत्र की विशेषता है। अलग-अलग विचारों का साथ आना कोई दोष नहीं।”
“बिल्कुल सही, राजन!” बेताल बोला, “लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब विविधता और दिशाहीनता के बीच का अंतर मिटने लगे। कांग्रेस के सामने भी यही राजनीतिक प्रश्न बार-बार उठता है। एक ओर वह अपने ऐतिहासिक नेतृत्व और राष्ट्रीय पहचान की बात करती है, दूसरी ओर उसके राजनीतिक विरोधी उस पर वामपंथी विचारों के निकट जाने का आरोप लगाते हैं। कभी वह मध्यमार्ग की भाषा बोलती दिखाई देती है, तो कभी उसकी राजनीतिक शब्दावली में ऐसे स्वर सुनाई देते हैं, जिनकी व्याख्या पर ही बहस छिड़ जाती है।”
विक्रम ने पूछा, “तो क्या हर वामपंथी विचार गलत है?”
बेताल खिलखिलाया, “नहीं राजन! विचारों को गलत या सही ठहराने से पहले उनकी जाँच करनी चाहिए। मेरा प्रश्न तो यह है कि किसी दल की राजनीति का आधार स्पष्ट है या केवल चुनावी सुविधा के अनुसार बदलती हुई शब्दावली? यदि कोई दल समाजवाद की बात करता है, तो उसे बताना चाहिए कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसरों के मामले में उसकी नीतियाँ क्या हैं। यदि वह मध्यमार्गी है, तो उसे अपनी नीतियों और व्यवहार में उस मध्यमार्ग की पहचान भी करानी चाहिए। केवल राजनीतिक विरोधियों को किसी विचारधारा का ठप्पा लगा देने से जनता के प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता।”
इतना कहकर बेताल ने करवट बदली और बोला, “अब राजन, उस युवा नेता की चर्चा करें, जिसके कंधों पर एक पुराने राजनीतिक साम्राज्य की विरासत है। उनके सामने चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, अपितु पार्टी को ऐसा संगठन बनाने की भी है, जो बदलते भारत की आकांक्षाओं को समझ सके।”
विक्रम बोले, “तुम राहुल गांधी की बात कर रहे हो?”
“राजन, तुम्हारी पहचानने की शक्ति कमाल की है!” बेताल बोला। “राहुल गांधी भारतीय राजनीति में एक प्रमुख चेहरा हैं। वे सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं, सामाजिक न्याय की बात करते हैं और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों को उठाते हैं। इन मुद्दों पर बहस हो सकती है, समर्थन भी मिल सकता है और विरोध भी। लेकिन किसी भी बड़े नेता की असली परीक्षा भाषणों की तालियों से नहीं, बल्कि उसके विचारों की स्पष्टता, संगठन की मजबूती और जनता के बीच उसके राजनीतिक संदेश की विश्वसनीयता से होती है।”
विक्रम ने कहा, “लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल उठाना भी है।”
बेताल तुरंत बोला, “निस्संदेह! मगर राजन, प्रश्न पूछने वाले से भी कभी-कभी प्रश्न पूछे जाते हैं। सरकार से पूछा जाता है कि उसने क्या किया,विपक्ष से पूछा जाता है कि वह सत्ता में आया तो क्या करेगा। सरकार की विफलताओं की सूची गिनाना आसान है, लेकिन अपनी नीतियों का ऐसा खाका प्रस्तुत करना कठिन है, जिसमें अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा और सामाजिक सद्भाव के प्रश्नों के ठोस उत्तर हों।”
“तो क्या राहुल गांधी को सवाल नहीं उठाने चाहिए?” विक्रम ने पूछा।
बेताल हँस खिलखिलाकर पड़ा, “राजन! यही तो राजनीति का सबसे मनोरंजक भ्रम है। आलोचना करने वाले से कहा जाता है कि वह केवल आलोचना करता है; समाधान बताने वाले से पूछा जाता है कि उसका समाधान लागू कैसे होगा। राहुल गांधी हों या कोई दूसरा विपक्षी नेता, जनता अंततः यही जानना चाहती है कि उसके जीवन में बदलाव लाने के लिए उनके पास कौन-सी व्यावहारिक योजना है।”
बेताल आगे बोला, “राजन! किसी राजनीतिक दल को वामपंथी कह देना आसान है, लेकिन यह देखना अधिक आवश्यक है कि उसकी नीतियाँ किस दिशा में जाती हैं। कांग्रेस की आर्थिक नीतियों, सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण और विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ उसके गठबंधनों को लेकर बहस होती रही है। मगर राजनीतिक विश्लेषण केवल आरोपों से पूरा नहीं होता। उसके लिए नीतियों, वक्तव्यों और निर्णयों की तुलना करनी पड़ती है।”
विक्रम ने कहा, “लेकिन राजनीतिक दलों को गठबंधन भी करने पड़ते हैं। क्या यह व्यावहारिक राजनीति का हिस्सा नहीं?”
“बिल्कुल है!” बेताल ने उत्तर दिया। “लेकिन गठबंधन की राजनीति में एक प्रश्न हमेशा खड़ा रहता है...समझौता कहाँ तक और सिद्धांत कहाँ से? यदि कोई दल किसी दूसरे दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ता है, तो उसे अपने मतदाताओं को बताना चाहिए कि साझा कार्यक्रम में उसकी प्राथमिकताएँ क्या हैं। यदि वह किसी विचारधारा से असहमत है, तो उस असहमति की सीमा भी स्पष्ट होनी चाहिए। अन्यथा मतदाता के मन में वही प्रश्न उठता है, जो आज तुम्हारे मन में उठ रहा है...यह दल अपनी विचारधारा चला रहा है या विचारधारा उसे चला रही है?”
विक्रम हँसे बिना नहीं रह सके।
बेताल बोला, “राजन! कांग्रेस के लिए चुनौती केवल यह नहीं कि उसके विरोधी उसे वामपंथी कहकर घेरते हैं। चुनौती यह भी है कि वह अपने कार्यक्रम और नीतियों के माध्यम से अपने राजनीतिक स्वरूप को कितनी स्पष्टता से सामने रखती है। यदि उसकी राजनीति मध्यमार्गी है, तो उसकी पहचान केवल घोषणाओं में नहीं, बल्कि निर्णयों में भी दिखाई देनी चाहिए। और यदि वह सामाजिक-आर्थिक बदलाव की अधिक व्यापक परियोजना लेकर चल रही है, तो उसे उस परियोजना का स्वरूप स्पष्ट करना चाहिए।”
“अब एक और प्रश्न सुनो, राजन!” बेताल ने कहा। “किसी भी राजनीतिक दल की विरासत उसके लिए पूँजी भी होती है और परीक्षा भी। इतिहास उसे पहचान देता है, लेकिन भविष्य की गारंटी नहीं। जनता पुराने योगदान को याद रख सकती है, मगर हर चुनाव में वह वर्तमान प्रदर्शन और भविष्य की उम्मीदों का हिसाब भी माँगती है।”
विक्रम बोले, “अर्थात विरासत का सम्मान हो, लेकिन वर्तमान की परीक्षा भी हो?”
“ठीक कहा!” बेताल बोला। “कांग्रेस के सामने यही चुनौती है। उसे अपने ऐतिहासिक योगदान का उल्लेख करने का अधिकार है, लेकिन उस इतिहास के आधार पर आज के मतदाताओं से स्थायी समर्थन की अपेक्षा नहीं की जा सकती। उसे संगठन में नई ऊर्जा, स्थानीय नेतृत्व को अवसर, नीतिगत स्पष्टता और जनता के रोजमर्रा के प्रश्नों से जुड़ाव दिखाना होगा।”
“और राहुल गांधी की भूमिका?”
“उनके सामने भी यही कसौटी है, राजन! किसी बड़े राजनीतिक परिवार से आना अपने आप में न तो योग्यता का प्रमाण है, न अयोग्यता का। अंततः नेता का मूल्यांकन उसके काम, विचारों, निर्णयों और जनता से संवाद के आधार पर होना चाहिए। यदि वह पार्टी को नई दिशा देना चाहता है, तो उस दिशा का परिणाम संगठन की सक्रियता, नीतियों की स्पष्टता और चुनावी राजनीति में जनता के भरोसे के रूप में दिखाई देना चाहिए।”
इतना कहकर बेताल ने राजा विक्रमादित्य से कहा, “राजन! अब मेरी पहेली का उत्तर दो। यदि कांग्रेस अपनी ऐतिहासिक विरासत का दावा करती है, सामाजिक न्याय की बात करती है, कभी मध्यमार्गी राजनीति का परिचय देती है और उसके नेतृत्व पर वामपंथी विचारों के प्रभाव को लेकर भी बहस होती है, तो उसकी सबसे बड़ी चुनौती क्या है? क्या उसे वामपंथ से दूरी बनानी चाहिए, अपने पुराने मध्यमार्ग पर लौटना चाहिए या केवल अपने विरोधियों के आरोपों का उत्तर देते रहना चाहिए?”
राजा विक्रम कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले, “बेताल! किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी चुनौती किसी एक विचारधारा से निकटता या दूरी नहीं, बल्कि अपने विचारों और नीतियों के प्रति स्पष्टता है। लोकतंत्र में वामपंथ, दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग...सभी की परीक्षा जनता के सामने होती है। कांग्रेस को यदि अपने राजनीतिक भविष्य को मजबूत करना है, तो उसे आरोपों की बहस से आगे बढ़कर अपने कार्यक्रम, नेतृत्व और संगठन की विश्वसनीयता साबित करनी होगी। राहुल गांधी को भी यह दिखाना होगा कि वे केवल विरोध की आवाज नहीं, बल्कि वैकल्पिक नीतियों और प्रभावी नेतृत्व की क्षमता भी रखते हैं।”
बेताल ने गर्दन घुमाई और हँसते हुए कहा, “वाह राजन! तुमने तो मेरी पहेली का उत्तर दे दिया। मगर एक प्रश्न और है—यदि कोई दल हर चुनाव के बाद आत्ममंथन का वादा करे और अगले चुनाव से पहले फिर वही पुराने प्रश्न उसके सामने खड़े हो जाएँ, तो इसे आत्ममंथन कहेंगे या राजनीतिक पुनर्प्रसारण?”
विक्रम के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
वे बोले, “बेताल! यह उत्तर तो उस दल के नेताओं को ही देना होगा।”
बेताल ठहाका मारकर बोला, “सही कहा, राजन! लोकतंत्र में जनता केवल भाषण नहीं सुनती, हिसाब भी रखती है। इतिहास किसी दल को पहचान दे सकता है, लेकिन भविष्य में जगह बनाने के लिए उसे वर्तमान में अपना काम दिखाना ही पड़ता है।”
इतना कहते ही बेताल फिर विक्रम के कंधे से उड़कर पेड़ पर जा लटका।
राजा विक्रमादित्य तलवार सँभालते हुए पुनः उसकी ओर चल पड़े। उधर बेताल की हँसी गूँज रही थी और भारतीय राजनीति का सबसे पुराना प्रश्न हवा में तैर रहा था...
“सत्ता का रास्ता विचारधारा से होकर जाता है या विचारधारा का रास्ता सत्ता की सुविधा से होकर?”
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक नेता के पास नहीं, लोकतंत्र के पास है। और लोकतंत्र में अंतिम निर्णय न बेताल सुनाता है, न विक्रम...वह निर्णय जनता अपने विवेक, अनुभव और मताधिकार से सुनाती है।
बस-यूँही-रघुनाथ

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