Skip to main content

भारत-कनाडा संबंधों में दरार: चरमपंथ और राजनीति का खेल

हाल के दिनों में भारत और कनाडा के संबंधों में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इस तनाव का केंद्र बिंदु कनाडा में सक्रिय कट्टरपंथी और अलगाववादी ताकतों का उभार है, जिन्हें भारत के खिलाफ माहौल बनाने का अवसर मिल रहा है। हाल ही में ब्रैंप्टन के हिन्दू सभा मंदिर में कथित खालिस्तानी समर्थकों द्वारा तोड़-फोड़ और हमला, इस मुद्दे को और गंभीर बना गया है। यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि एक लंबे समय से चले आ रहे विवाद का प्रतीक बन गई है, जिसमें कनाडा की चरमपंथियों के प्रति नर्म नीति, भारत पर आरोपों का सिलसिला और दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ते मतभेद शामिल हैं। आज जब दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट अपने चरम पर है, ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कनाडा में मौजूद राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ कैसे इन संबंधों पर असर डाल रही हैं। इसके साथ ही, यह जानना भी आवश्यक है कि इन परिस्थितियों का भारत-कनाडा के व्यापार, शिक्षा, पर्यटन और दोनों देशों के नागरिकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

ब्रैंप्टन मंदिर हमला: एक गंभीर चेतावनी
3 अक्टूबर, 2024 को ब्रैंप्टन के हिन्दू सभा मंदिर के बाहर झड़पें हुईं, जिसमें खालिस्तानी झंडे लिए हुए प्रदर्शनकारियों ने मंदिर में आई भीड़, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, पर हमला किया। इस घटना से कनाडा में बसे भारतीय समुदाय के लोगों के मन में गहरा असुरक्षा का भाव पैदा हो गया है। भारत सरकार ने इस घटना पर कड़ा विरोध जताते हुए कनाडा सरकार से अपने नागरिकों और उनके धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। 

भारत के लिए यह हमला केवल एक धार्मिक स्थल पर हमले से अधिक है। यह उसके सांस्कृतिक प्रतीकों पर आघात है और उसके प्रवासी नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता का विषय है। इस घटना के बाद, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इसे भारत की संप्रभुता और इसके वैश्विक छवि पर एक सीधा हमला करार दिया। 

कनाडा में चरमपंथियों को बढ़ावा देने वाला राजनीतिक माहौल
भारत लंबे समय से कनाडा के अंदर चरमपंथी समूहों के उभार को लेकर अपनी चिंताओं को व्यक्त करता रहा है। कनाडा में खालिस्तानी समर्थक गुट न केवल भारत के खिलाफ नफरत फैलाते हैं, बल्कि खुलेआम हिंसा और अलगाव की बातें करते हैं। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि कुछ कनाडाई राजनेता इन समूहों को वोट बैंक की राजनीति के लिए बढ़ावा दे रहे हैं, जो कि दोनों देशों के रिश्तों के लिए घातक है। 

कनाडा का बहुसंस्कृतिवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर देना एक सराहनीय बात है, लेकिन इसकी आड़ में चरमपंथियों को खुली छूट देना गंभीर चिंता का विषय है। भारत के दृष्टिकोण से कनाडा की सरकार का चरमपंथियों के खिलाफ ठोस कदम न उठाना और उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए ढील देना उसकी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती है। भारत मानता है कि चरमपंथी विचारधारा और हिंसक गतिविधियों को कभी भी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के नाम पर बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। 

भारत पर निराधार आरोपों का सिलसिला
भारत-कनाडा संबंधों में एक और बड़ा मुद्दा कनाडा का बार-बार भारत पर निराधार आरोप लगाना है। पिछले कुछ महीनों में कनाडा ने भारत पर कई आरोप लगाए हैं, जिनमें सबसे हालिया मामला खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या से संबंधित है। कनाडा का आरोप है कि इस हत्या में भारत का हाथ है, लेकिन भारत का कहना है कि यह आरोप निराधार हैं और इसमें कोई पुख्ता सबूत नहीं है। 

भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने इस संबंध में कहा कि बिना सबूत के लगाए गए ये आरोप कनाडा की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं और दोनों देशों के बीच के राजनयिक विश्वास को भी हिला देते हैं। भारत के लिए ये आरोप न केवल अपमानजनक हैं, बल्कि इसकी अंतर्राष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुँचाते हैं।
 

भारतीय राजनयिकों पर नजरदारी
कनाडा द्वारा भारतीय राजनयिकों पर कथित रूप से निगरानी रखना दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा रहा है। भारत के अनुसार, यह एक गंभीर अंतर्राष्ट्रीय मानक का उल्लंघन है। राजनयिकों को सुरक्षा और स्वतंत्रता देना किसी भी देश के लिए अनिवार्य होता है, ताकि वे अपनी भूमिका बिना किसी बाधा के निभा सकें। कनाडा की इस हरकत को भारत ने राजनयिक नियमों का उल्लंघन करार दिया है। 

भारत के लिए यह मुद्दा केवल सुरक्षा का नहीं है, बल्कि उसकी संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान से भी जुड़ा है। यदि किसी देश के राजनयिकों पर नजरदारी की जाती है, तो इससे उस देश के साथ संबंधों में गिरावट आना स्वाभाविक है। 

कनाडा का बहुसंस्कृतिवाद और चरमपंथ
कनाडा का बहुसंस्कृतिवादी दृष्टिकोण, जो दुनियाभर में उसकी खास पहचान बनाता है, अब उसे चरमपंथ के मुद्दों के संदर्भ में कठिनाइयों में डाल रहा है। कनाडा में विभिन्न समुदायों का स्वागत करने वाली यह नीति उसकी राजनीति में विभाजन और मतभेद को बढ़ावा देने लगी है। कुछ चरमपंथी गुट, जिनमें खालिस्तानी समर्थक भी शामिल हैं, कनाडा की इस खुली नीति का दुरुपयोग कर रहे हैं। 

कनाडा में चरमपंथी गतिविधियों का उभार केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि कनाडा के भीतर भी अशांति का कारण बन सकता है। वहाँ की सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह कैसे बहुसंस्कृतिवाद और स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए चरमपंथी गतिविधियों पर रोक लगा सके। भारत के लिए यह सवाल बना हुआ है कि क्या कनाडा अपने बहुसंस्कृतिवाद का संतुलन चरमपंथ के खतरों से बचाव के साथ कर सकता है। 

व्यापार, शिक्षा और पर्यटन पर प्रभाव
भारत-कनाडा के इस राजनयिक संकट का असर दोनों देशों के व्यापार, शिक्षा और पर्यटन संबंधों पर भी देखने को मिल रहा है। कनाडा में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र शिक्षा प्राप्त करने जाते हैं और भारतीय कंपनियाँ भी कनाडा में भारी निवेश कर रही हैं। लेकिन वर्तमान तनावपूर्ण माहौल में इन क्षेत्रों पर असर पड़ने की संभावना बढ़ रही है। व्यापारिक समझौतों और निवेश के अवसरों पर पुनर्विचार किया जा सकता है और भारत उन देशों को प्राथमिकता देने की कोशिश कर सकता है जिनके साथ उसके संबंध स्थिर और सुरक्षित हैं। 

इसके अलावा, पर्यटन पर भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है। भारतीय समुदाय के बीच सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के चलते कनाडा जाने वाले भारतीयों की संख्या में कमी आ सकती है। इस संकट का प्रत्यक्ष आर्थिक प्रभाव कनाडा पर पड़ सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ भारतीय समुदाय का महत्वपूर्ण योगदान है।

भारत-कनाडा के तनाव को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने भी गंभीरता से देखा है। अमेरिका, ब्रिटेन और कई अन्य देशों ने इस मामले में सतर्क रुख अपनाया है और बातचीत के माध्यम से समाधान की वकालत की है। भारत और कनाडा दोनों महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का हिस्सा हैं, जिनमें राष्ट्रमंडल और नाटो जैसे संगठन शामिल हैं। ऐसे में इन संगठनों की प्रतिक्रियाएँ और अन्य देशों की सलाह दोनों देशों के भविष्य के कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं। 

चरमपंथ एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या
भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि चरमपंथ एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से ही नियंत्रित किया जा सकता है। भारत के लिए, कनाडा का चरमपंथियों के प्रति ढीला रुख यह सवाल उठाता है कि क्या वैश्विक समुदाय चरमपंथ के खतरों से निपटने के लिए सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपना सकता है। 

भारत की माँग: जवाबदेही और दीर्घकालिक समाधान
भारत ने कनाडा से केवल बयानबाजी के बजाय ठोस कार्रवाई की माँग की है। कनाडा में चरमपंथियों पर सख्ती से नजर रखने, उनके भाषणों पर अंकुश लगाने और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की माँग की है। भारत चाहता है कि कनाडा चरमपंथी ताकतों को नियंत्रित करने के लिए अपने अंदरूनी राजनीतिक नीतियों में सुधार लाए, ताकि वह चरमपंथी विचारधारा को अपनी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने से रोक सके।भारत यह भी मानता है कि दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण मुद्दों का समाधान तभी संभव है, जब कनाडा अपने आंतरिक मुद्दों का संतुलन बनाते हुए चरमपंथ के प्रति सख्त रुख अपनाए।

भारत-कनाडा संबंध एक अहम मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ इन पर विचारशीलता, परिपक्वता और सख्ती से काम करने की आवश्यकता है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मैत्रीपूर्ण संबंधों को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि कनाडा चरमपंथियों पर सख्त कार्रवाई करे और भारत की संप्रभुता और सम्मान को सुरक्षित रखे। यदि दोनों देशों के नेता दूरदर्शिता से काम लेते हैं, तो आने वाले समय में इन मुद्दों को हल करने की संभावना बन सकती है।

✍️... रघुनाथ सिंह



Comments

Popular posts from this blog

व्यंग्य: सैयारा फिल्म नहीं, निब्बा-निब्बियों की कांव-कांव सभा है!

इन दिनों अगर आप सोशल मीडिया पर ज़रा भी एक्टिव हैं, तो आपने ज़रूर देखा होगा कि "सैयारा" नामक कोई फिल्म ऐसी छाई है जैसे स्कूल की कैंटीन में समोसे मुफ्त में बंट रहे हों। इस फिल्म का इतना क्रेज है कि मानो ये देखी नहीं तो सीधे स्वर्ग का टिकट कैंसिल हो जाएगा और नरक में आपको खौलते हुए गर्म तेल में तला जायेगा, वो भी बिना ब्रेक के लगातार। सच बताऊं तो, मैंने अब तक इस फिल्म को नहीं देखा। वास्तव में थियेटर में जाकर इस फिल्म को देखने का कोई इरादा भी नहीं है। क्योंकि मेरा दिल अब भी सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के उन पंखों में अटका है जो बिना हिले भी आवाज़ करते हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर पर जो तमाशा चल रहा है, वो देखकर लग रहा है कि या तो मैं बहुत ही बासी किस्म का मनुष्य हूं या फिर बाकी दुनिया ज़रा ज़्यादा ही Acting Class  से पास आउट है। एक साहब वीडियो में रोते-रोते इतने डूबे कि लगा अभी स्क्रीन से निकलकर ‘सैयारा’ के पायलट को गले लगा लेंगे।  दूसरी तरफ एक मैडम तो थिएटर की कुर्सी से चिपककर ऐसे चिल्ला रही थीं जैसे उनकी पुरानी गुम हुई टेडीबियर वापस मिल गई हो। कोई गला फाड़ रहा है, कोई आंखों से आंसुओं क...

ध्यानी नहीं शिव सारस

!!देव संस्कृति विश्विद्यालय में स्थपित प्रज्ञेश्वर महादेव!! ध्यानी नहीं शिव सारसा, ग्यानी सा गोरख।  ररै रमै सूं निसतिरयां, कोड़ अठासी रिख।। साभार : हंसा तो मोती चुगैं पुस्तक से शिव जैसा ध्यानी नहीं है। ध्यानी हो तो शिव जैसा हो। क्या अर्थ है? ध्यान का अर्थ होता हैः न विचार, वासना, न स्मृति, न कल्पना। ध्यान का अर्थ होता हैः भीतर सिर्फ होना मात्र। इसीलिए शिव को मृत्यु का, विध्वंस का, विनाश का देवता कहा है। क्योंकि ध्यान विध्वंस है--विध्वंस है मन का। मन ही संसार है। मन ही सृजन है। मन ही सृष्टि है। मन गया कि प्रलय हो गई। ऐसा मत सोचो कि किसी दिन प्रलय होती है। ऐसा मत सोचो कि एक दिन आएगा जब प्रलय हो जाएगी और सब विध्वंस हो जाएगा। नहीं, जो भी ध्यान में उतरता है, उसकी प्रलय हो जाती है। जो भी ध्यान में उतरता है, उसके भीतर शिव का पदार्पण हो जाता है। ध्यान है मृत्यु--मन की मृत्यु, "मैं" की मृत्यु, विचार का अंत। शुद्ध चैतन्य रह जाए--दर्पण जैसा खाली! कोई प्रतिबिंब न बने। तो एक तो यात्रा है ध्यान की। और फिर ध्यान से ही ज्ञान का जन्म होता है। जो ज्ञान ध्यान के बिना तुम इकट्ठा ...

जहाँ लौकी बोलती है, वहाँ कुकर फटता नहीं, पंचायत ने बता दिया, कहानी कहने के लिए कपड़े उतारने की ज़रूरत नहीं होती

आज के दौर में सिनेमाई कहानी कहने की दुनिया जिस मार्ग पर चल पड़ी है, वहाँ पटकथा से ज़्यादा त्वचा की परतों पर कैमरा टिकता है। नायक और नायिका के संवादों की जगह ‘सीन’ बोलते हैं और भावनाओं की जगह अंग प्रदर्शन ‘व्यू’ बटोरते हैं। इसे नाम दिया गया है ‘क्रिएटिव फ्रीडम’।  वेब सीरीजों के लिए बड़े बड़े बजट, चमकदार चेहरे और नग्न दृश्य अब ‘रियलिज़्म’ का नकली नकाब ओढ़ कर दर्शकों को भरमाते हैं। मगर इस सब के बीच अगर कोई सीरीज़ बिना चीखे, बिना झूठे नारे, और बिना कपड़े उतारे भी सीधे दिल में उतर जाए — तो वो "पंचायत" वेब सीरीज है। TVF की यह अनोखी पेशकश इस धारणा को चुनौती देती है कि दर्शकों को केवल ‘बोल्डनेस’ ही चाहिए। पंचायत ने बता दिया कि अगर आपकी कहानी सच्ची हो, तो सादगी ही सबसे बड़ी क्रांति बन जाती है। हालिया रिलीज "पंचायत" उन कहानियों के लिए एक तमाचा है जो यह मानकर चलती हैं कि जब तक किरदार बिस्तर पर नहीं दिखेंगे, तब तक दर्शक स्क्रीन पर नहीं टिकेगा। पंचायत दिखाती है कि गाँव की सबसे बड़ी लड़ाई किसी बिस्तर पर नहीं, बल्कि पंचायत भवन के फर्श पर लड़ी जाती है, कभी लौकी के नाम पर, तो कभी कु...