Image Source: Google भारतीय सनातन संस्कृति में करवाचौथ का व्रत केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं, अपितु प्रेम और चेतना का दिव्य उत्सव है। यह वह दिन है जब स्त्री अपने भीतर की ऊर्जा को श्रद्धा, संयम और सजगता के माध्यम से एक उच्च अवस्था में रूपांतरित करती है। उपवास का अर्थ केवल अन्न या जल का त्याग नहीं होता, अपितु अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर विजय पाने की साधना है। जब कोई भूख और प्यास को भी साक्षीभाव से देखता है, तो वह अपने भीतर यह अनुभव करता है कि वह शरीर नहीं है, अपितु उस शरीर को देखने वाली चेतना है। यह व्रत किसी बाहरी कर्मकांड की कठोरता नहीं, अपितु आंतरिक अनुशासन की कोमलता है। इसमें प्रेम का वह रूप प्रकट होता है, जो अधिकार से नहीं, समर्पण से उपजता है। सच्चे प्रेम में दासता नहीं होती, उसमें स्वतंत्रता की गंध होती है। जब कोई प्रेम में यह कहता है कि मैं तुम्हारे साथ जीवन के संगीत में एक सुर बनकर रहूँगा, तब वह प्रेम किसी सीमित भावना से ऊपर उठकर ध्यान बन जाता है। यही इस व्रत का मर्म है, जहाँ प्रेम और ध्यान एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। करवाचौथ की रात का सबसे सुंदर और आलोकित क्षण वह होता है ...
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